कुछ सफ़र किताबों में नहीं मिलते,
उन्हें जीना पड़ता है।
कुछ जीतें संयोग नहीं होतीं,
उन्हें हर दिन थोड़ा-थोड़ा सींचना पड़ता है।
और आज,
जब बिहार लोक सेवा आयोग की सूची में
रैंक 123 के साथ तुम्हारा नाम चमका है,
तो लगता है जैसे वर्षों का संघर्ष
एक मुस्कान बनकर लौट आया हो।
लोग कहेंगे—
भाग्य अच्छा था,
दुआएँ काम आ गईं,
समय साथ दे गया।
पर मैं सच जानता हूँ,
उन दुआओं के पीछे कितने ताने भी थे,
कितनी सलाहों के भेष में निराशाएँ थीं,
कितने सवाल थे जो हर मोड़ पर
तुम्हारे आत्मविश्वास को परखते रहे।
तुमने सब सुना...
पर हर बात का उत्तर शब्दों से नहीं,
अपने कर्मों से दिया।
मुझे याद है वह समय,
जब छोटी-छोटी बातें भी तुम्हें परेशान कर देती थीं,
जब दूसरों के विचार
तुम्हारे मन में घंटों मंथन करते रहते थे,
जब दुनिया की आवाज़ें
तुम्हारी अपनी आवाज़ को दबा देती थीं।
फिर एक दिन,
तुमने स्वयं को सुनना शुरू कर किया।
और जिस दिन तुमने
दुनिया को समझाने की जगह
खुद को समझना शुरू किया,
उसी दिन तुम्हारी जीत लिखी जा चुकी थी।
राँची की गलियों से,
पटना की भागदौड़ तक,
दिल्ली की दूरियों से,
अनगिनत किताबों, नोट्स,
नींदहीन रातों और अनकहे संघर्षों तक।
यह जो मुकाम आज तुम्हारे सामने खड़ा है,
उसकी हर ईंट पर
सिर्फ तुम्हारा नाम लिखा है।
क्योंकि कुछ सफलताएँ साझा नहीं होतीं,
उन पर केवल उस इंसान का अधिकार होता है
जिसने उन्हें पाने के लिए
अपना सब कुछ दाँव पर लगाया हो।
और शायद इसलिए
इस सफलता का श्रेय भी
सबसे अधिक तुम्हें ही जाता है।
तुम "स्त्री-मन" की लेखिका हो... तुमने लिखा था:
"ख़्वाहिशों में भी दम भरना,
ग़ैर-ज़रूरी बातों का ख़याल अनसुना कर
तू बस चलती रह,
और एक दिन तू उड़ जाना।
याद रख,
स्त्री है तू,
कभी बेचारी नहीं,
समंदर है तू।"
आज लगता है,
तुमने केवल यह कविता नहीं लिखी थी,
तुमने अपना भविष्य लिख दिया था।
तुमने साबित कर दिया कि
स्त्री दया की पात्र नहीं,
संभावनाओं की पराकाष्ठा है।
तुमने साबित कर दिया कि
समाज की तकियानूसी सोच से बड़ी
एक स्त्री की इच्छा-शक्ति होती है।
तुमने साबित कर दिया कि
जब मनुष्य स्वयं पर विश्वास कर ले,
तो इतिहास उसके लिए जगह बना लेता है।
आज वही समाज,
जो कभी तुम्हें समझ नहीं पाया,
तुम्हारी उपलब्धि पर ताली बजा रहा है,
केवल अपने स्वार्थ के लिए।
और तुम...
अपने बड़े हृदय के साथ
सबको धन्यवाद कह रही हो।
यही तुम्हारी सबसे बड़ी सुंदरता है।
तुम्हारे भीतर की लेखिका,
तुम्हारे भीतर की चिकित्सक,
तुम्हारे भीतर की संघर्षशील स्त्री,
और तुम्हारे भीतर की प्रशासक—
आज सब एक साथ मुस्कुरा रहे होंगे।
बस एक बात याद रखना मित्र,
अपनी आँखों में अब कोई आँसू कभी ठहरने मत देना।
फूल की तरह खिलते रहना,
अपनी खुशबू हर दिशा में बिखेरते रहना।
क्योंकि कुछ लोग स्वभाव से बड़े होते हैं,
और तुम उन्हीं लोगों में से हो।
पटना के हनुमान मंदिर का लड्डू हो,
या गया जी की रामदाना का लाई,
आज हर मिठास फीकी लग रही है मुझे।
क्योंकि वर्षों की तपस्या के बाद
जो सुख मिलता है,
उसका स्वाद किसी प्रसाद,
किसी उत्सव,
किसी मिठाई में नहीं होता।
वह बस हृदय में उतरता है।
रैंक 123 एक संख्या हो सकती है,
पर मेरी नज़रों में डॉ. कविता की एक कविता हैं।
और यह कविता
संघर्ष से शांति तक की यात्रा है।
ऐसी यात्रा,
जिसे समय मिटा नहीं सकता।
खैर, एक दो तीन
मुझे है डॉ. कविता पे यकीन