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कौन-सी लकीर नहीं है मेरे हाथों में

Ashfaque Alam

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            बता दो ज़रा, कौन-सी लकीर नहीं है मेरे हाथों में।
        
                                                    
                            
क्यों हर ख़ुशी लिखी तक़दीर नहीं है मेरे हाथों में।

जिसे माँगा वही मुझसे कहीं दूर चला गया,
शायद कोई पूरी होती तदबीर नहीं है मेरे हाथों में।

दूसरों के हिस्से में क्यों आसानी से आ जाता है सब,
मेरे हिस्से में मगर कोई जागीर नहीं है मेरे हाथों में।

मैंने मेहनत में कभी कोई कमी रखी नहीं,
फिर भी शायद मेरे नाम की तक़दीर नहीं है मेरे हाथों में।

हर बार किनारे तक आकर लौट जाती है मेरी नाव,
लगता है मंज़िल की कोई तस्वीर नहीं है मेरे हाथों में।

मैंने तो माँगा था बस थोड़ा-सा सुकून ज़िंदगी से,
क्या इतना भी पाने की ताबीर नहीं है मेरे हाथों में?

‘अशफ़ाक़’ अब शिकायत भी किससे करे ये दिल,
जब शायद मेरी कहानी की तहरीर नहीं है मेरे हाथों में।
3 घंटे पहले
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