ऐ ज़िंदगी तेरे साथ हम हर
खुशी ग़म सह गये।
जो करना चाहा ना कभी वो
काम भी हम कर गये।।
क्या मेरी तक़दीर थी हर
राह पर कांटे मिले।
एक एक कदम संभाला पर
पांव में कुछ गड़ गया।।
दिल में थी जीने की ललक
पलकों की कोरे भींगी थी।
हूई ज़िंदगी कामयाब पर
नासूर दिल में रह गया।
अपने ग़मो से सींच कर जिन
होंठों को मुस्कान दी।
आगे सफ़र में बढ़ के वो मुझको
अकेला कर गया।।
अफ़्साना-ए-ज़िंदगी मेरी पहुंची
कभी ना मक़ाम पर।
आंसू छुपा लिए आंखों में दिल में
कसक सा रह गया।।