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मैं मुकम्मल एक किताब हूँ।

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Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            पन्नों के हिसाब से परे
        
                                                    
                            
किताबों के भारी बस्तों में,
सपनों का बोझ उठाता हूँ।
हर पन्ने पर कुछ नंबर हैं,
जिनमें ख़ुद को तौलता पाता हूँ।
घड़ी की टिक-टिक कहती है,
कि दौड़ में आगे जाना है।
अंकों की इस भीड़ में शायद,
अपनी पहचान बनाना है।
पर मन के किसी कोने में,
एक ख़्वाब अभी भी ज़िंदा है।
जो सीमाओं को नहीं मानता,
वो आज़ाद परिंदा है।
मैं महज़ परीक्षा का पर्चा नहीं,
न ही इन अंकों का हिसाब हूँ।
पन्नों की इस हद से आगे,
मैं मुकम्मल एक किताब हूँ।
एक महीने पहले
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