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विनती करते रोते बच्चे...

arun k Jain

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            अभी अभी हम बढ़े हुये हैं, बच्चे जग के कहलाते,
        
                                                    
                            
नन्हे नन्हे पैर हमारे, ढंग से भी न चल पाते.
कभी पार्क में माँ, बापू संग हम नित खेला करते थे,
हँसते, गाते, मस्ती करते, आगे बढ़ते रहते थे.

तुमने बरसाये नित गोले, राकेट, मिसाइल दागीं हैं,
इतनी आग लगायी जग में, धरती नर्क बना दी है.
धुँवा धरा पर और गगन में, ज़हर भर गया इस जग में,
हँसती, मुस्काती बगिया, शमशान सी सूनी पल भर में,

रो रोकर हम बिलख रहे हैं, साँसे अटक गयीं सबकीं,
माँ, पापा भी बिछड़ गये हैं, नहीं सहारा अब कोई,
सपने प्यारे हम सबने भी, सुखद, सुहाने देखे थे,
दुनियाँ को सुरभित करने के, मन में कुछ मंसूबे थे.

मार काट,हत्या, प्रहार से, डरे हुये हम, सहमे हैं,
किलकारी भरते बच्चे अब, रोते और सिसकते हैं,
ईश्वर, अल्लाह, प्रभु, जिनेश्वर, वाहे गुरु तो हो सबके,
फिर क्यों कुछ सनकी, पगलों से, डरे हुये हो प्रभु सबके?

विनती करते रोते बच्चे, इनके प्राण बचा लो तुम,
लाखों मासूमों के मन से , भय, संहार मिटा दो तुम,
शक्तिमान हो, पापी, कपटी, दुष्टों का संहार करो,
जो सब रहते, तेरे जग में, उनका बेड़ा पार करो.

स्वनिल सा संसार हमारा, सारी खुशियाँ लौटा दो,
प्रेम, नेह, अनुराग, प्रगति की, सुखद बयार यहाँ ला दो,
दरिंदगी जो करें यहाँ पर, उनको सख्त सज़ा तुम दो,
न समझें तो सबसे पहिले, उनका कुनबा मिटवा दो,

जार जार आँसू रोयेंगे, जब उजड़ेगा उनका संसार,
पीर वेदना जग को कितनी, तब जानेंगे नम्बरदार.

 
4 महीने पहले
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