ये आज़ादी किसी एक की देन नहीं,
ये लाखों कुर्बानियों का उजाला है।
मंगल पांडे की पहली चिंगारी से,
1857 का हर रण निराला है।
भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव ने
हँसकर फाँसी को गले लगाया,
रामप्रसाद बिस्मिल, अशफ़ाक़ उल्ला ने
वतन पर अपना जीवन लुटाया।
चंद्रशेखर आज़ाद की प्रतिज्ञा,
सुभाष की गूँजती हुंकार थी,
गांधी की अहिंसा, सरोजिनी की आवाज़,
हर दिल में आज़ादी की पुकार थी।
रानी लक्ष्मीबाई की तलवार थी,
बेगम हज़रत महल का साहस था,
उधम सिंह के सीने में
जलता हुआ एक संकल्प था।
कितने नाम इतिहास में दर्ज हुए,
कितने गुमनामी में सो गए—
उन सबके बलिदान से ही
हम आज़ाद होकर खड़े हुए।
आज जब तिरंगा आसमान छूता है,
तो दिल बस इतना कहता है—
ऐ शहीदों! तुम्हारी कुर्बानी से
मेरा हिंदुस्तान आज भी ज़िंदा है।