अक़्सर सोचता हूँ, अगर मैं शिकस्ता हूँ,
क्या सिर्फ़ इसी वजह से मैं तन्हा हूँ?
अगर सफ़र में मंज़िल मिल भी जाती,
तो क्या फिर सच में तन्हाई से आज़ाद हूँ?
लोग तो आते हैं सिर्फ़ रौशनी के साथ,
हर चेहरे पे चमक, हर लब पे बात।
पर जब उजाले से धुंध बन जाता है,
साये तक छोड़ देते हैं अपना साथ।
जो रुक जाते हैं, उनके इरादे भी अजीब होते हैं,
ना मोहब्बत का यक़ीन, ना वफ़ा के नसीब होते हैं।
क्या वो सच में अपने होते हैं, जो रुक जाते हैं?
या बस अपनी तन्हाई से डरते हुए क़रीब होते हैं?
और मैं, जो अपने ख़ौफ़ में डूबता रहा,
हर जवाब की तलाश में भटकता रहा,
सोचता हूँ — अगर शिकस्त न होती,
तो क्या सच में तन्हाई भी मेरी तक़दीर बन जाती?