विज्ञापन

बाहर-बाहर की बातों में कितना जीवन बीत गया

Anshul soni

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            बाहर-बाहर की बातों में,कितना जीवन बीत गया।
        
                                                    
                            
सुरा-स्वपन की पीते-पीते,कितना प्याला रीत गया।
मृगतृष्णा हमको दौड़ाती,कुछ ख्वाब दिखा के जीवन में
उछल-कूद हम पाते उनको,संताप कुछ मिटता है मन में
जीवन-पथ पर चलते-चलते,कुछ सुख के साधन मिलते हैं
मिथ्या-विभव के चन्द पुष्प,मन की बगिया में खिलते हैं
पर कुछ ही पल लगता है हमको मानो सब-कुछ जीत लिया
बाहर-बाहर की बातों में,कितना जीवन बीत गया।
सुरा-स्वपन की पीते-पीते,कितना प्याला रीत गया।
भीतर हमारे कौन है रहता,कौन वहाॅं पर है छिपा
कितनी दूरी हमसे उसकी,एक क्षण न हमें दिखा
जीवन मानो चौसर का खेल,मन जहाॅं फेंके अपने पासे
अंदर बैठा सब वो देखे,हम जो खेलें खेल-तमाशे
मृषा स्वर में मग्न मन,हर दिन गाता गीत नया
बाहर-बाहर की बातों में,कितना जीवन बीत गया।
सुरा-स्वपन की पीते-पीते,कितना प्याला रीत गया।
जीवन-प्याला पीते-पीते,जब कुछ घूॅंट ही बचते हैं
काल-देवता प्राण निकालने,अपनी माया रचते हैं
तब सुनते हम अंतर्गिरा,पर बहुत देर हो जाती है
जीवन रूपी इस भवन में,पूर्ण अंधेर हो जाती है
अभी बनालो अंतर्रात्मा को,अपना सच्चा मीत नया
बाहर-बाहर की बातों में,कितना जीवन बीत गया।
सुरा-स्वपन की पीते-पीते,कितना प्याला रीत गया।

लेखक-अंशुल सोनी
3 वर्ष पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all