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प्रेम निमंत्रण

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                            राधा न हो कान्हा की सांसों में जब
        
                                                    
                            
मधुवन में फिर कैसे बहे बाँसुरी
योवन के चित्र में रंगत न हो प्रेम की
फिर रागों में कैसे ढले माधुरी
सृष्टि का हर रूप अधूरा लगे
जब तक न अनुरा ग का दीप जले
राधा न हो कान्हा की सांसों में जब
मधुवन में फिर कैसे बहे बाँसुरी

साँझ ढलते ही चंदा गगन में सजा
चाँदनी का स्वयं सिंदूरी कँवल
हर कली को पवन का निमंत्रण मिला
झूम कर गा रही है नदी चंचल
सृष्टि के हर हृदय में जगा रूप रस
एक बस मैं विरही भटकता फिरा
देवता सा निरंतर तुम्हें पूजता
भाव अर्चन का पावन कलश ले गिरा
तुम शिव अंश सी अचल शांत हो प्रिय
बिन तुम्हारे अधूरी गगन माधुरी
राधा न हो कान्हा की सांसों में जब
मधुवन में फिर कैसे बहे बाँसुरी

दृष्टि में अलौकिक प्रभा सी खिली
केश जैसे घने सादगी के घने
बोल में रागिनी सा सुरम्य प्रवाह
अंग प्रत्यंग काव्य शिल्प बने
आंखों को तुम पढ़ो कहा कुछ नहीं
मौन ही भावना का अनूठा नगर
एकतरफ़ा समर्पण मेरा बन गया
हर धड़कन में अंकित तुम्हारा सफर
तू मिले तो पूर्ण हो अधूरा हृदय
बिन तुम्हारे न खिलती पुष्पि मञ्जरी
राधा न हो कान्हा की सांसों में जब
मधुवन में फिर कैसे बहे बाँसुरी

सत्य है प्रेम का यह निमंत्रण प्रिय
आओ अब मौन के आवरण को तजें
राह में हम कदम बनके साथ चलें
साँसों के साज़ पे प्रीत रागिनी बजें
यदि न माना निमंत्रण मेरा आज तुम
व्यर्थ है यह जवानी रूप श्रृंगार की
विश्व का हर महल भी तपोभूमि है
गर न बनीं स्वामिनी मेरे प्यार की
तू ही मेरी नियति तू ही मेरी सुबह
बिन तुम्हारे अधूरी दिशा की दूरी
राधा न हो कान्हा की सांसों में जब
मधुवन में फिर कैसे बहे बाँसुरी
-भानु शर्मा रंज
 
3 घंटे पहले
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