मैं गंगा के मैदान से
मैं हूं हिंदुस्तान से
जीता जिंदगी मैं शान से
करता बातें आसमान से
चौड़ा है सीना
लंबा बदन है
बहाता पसीना
बड़ा मन है
फौलादी हैं बांहें
लक्ष्य पर निगाहें
रख कर बड़े विचार
रख कर शक्ति अपार
करके कर्म हजार
करता मैं स्वदेश से प्यार
स्वदेश हित रहता मैं तैयार
वीरता है मेरा पहचान
चाहता हूं छू लूं आसमान
चाहता हूं करूं नव निर्माण
चला कर कर्म का वाण
रखूं ऊंचा स्वाभिमान
बनाऊं विकसित हिंदुस्तान
मैं बागी बलिया से
मैं बागी बैरिया से
झुकता नहीं शीष कभी
रूकता नहीं आशीष कभी
हैं जहां आम अमरूद के बागान
है जहां के मिट्टी में भगवान
है जहां से भृगु महान
चाहता हूं दूं बड़ा बलिदान
है यही मेरा पहचान
बढ़ता रहे मेरा हिंदुस्तान।
- सत्येन्द्र कुमार सिंह 'सहज'