पिताजी का अंतिम दर्शन करना भी मुश्किल है
क्योंकि नौकरी में फंसा हुआ मेरा दिल है
रोजी रोटी के चक्कर में बेच दिया दिल है
दो पैसे के लिए छोड़ दिया गांव का महफिल है
नौकरी क्या किया, गुलाम बन गया दिल है
"नौकरी न करी,
करी तो ना न करी"
जिसने कहा है
सच कहा है।
- सत्येन्द्र कुमार सिंह 'सहज'