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माँ के रिश्ते से बड़ा क्या कोई रिश्ता होगा -...

Anjum Lucknowi

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            यूँ तो कहने को हर इक चाहने वाला होगा।
        
                                                    
                            
माँ के रिश्ते से बड़ा क्या कोई रिश्ता होगा।

यह वह रिश्ता है जो पाकीज़ा हुआ करता है।
माँ का दिल बेटे के बस हक़ में दुआ करता है।

साथ हो जिसके दुआ उसका बुरा क्या होगा।
माँ के रिश्ते से बड़ा क्या कोई रिश्ता होगा।

फरमां बरदार पे तो फूल बरसते होंगे ।
माँ की खिदमत को फरिश्ते भी तरसते होंगे।

मेरी किस्मत पे तअज्जुब उन्हें होता होगा।
माँ के रिश्ते से बड़ा क्या कोई रिश्ता होगा।

माँ ना जिस घर में हो उस घर का है आंगन सूना ।
सब्ज़ गुलशन को भी कहना पड़े गुलशन सूना ।

ऐसे गुलशन में कोई पेड़ हरा क्या होगा ।
माँ के रिश्ते से बड़ा क्या कोई रिश्ता होगा।

कितने नाज़ों से मेरी माँ ने है पाला मुझको ।
भूख से पहले ही देती है निवाला मुझ को ।

माँ के एहसान का हक़ मुझ से अदा क्या होगा ।
माँ के रिश्ते से बड़ा क्या कोई रिश्ता होगा ।

तुमको बतलाता हूँ मैं माँ की फजीलत क्या है।
माँ के क़दमों तले जन्नत का दरीचा वा है ।

यह है फरमाने नबी यह नहीं झूठा होगा ।
माँ के रिश्ते से बड़ा क्या कोई रिश्ता होगा।

जब यतीमी को ज़माना मेरी ठुकराता है।
माँ का दिल कब्र के अंदर भी तड़प जाता है।

उसकी ममता को मेरा रब ही समझता होगा ।
माँ के रिश्ते से बड़ा क्या कोई रिश्ता होगा ।

मुझ पे परदेश में अंजुम जो बला आती है।
माँ तसव्वुर में मेरे सामने आ जाती है।

मैं समझता हूँ यही वक्त दुआ का होगा ।
माँ के रिश्ते से बड़ा क्या कोई रिश्ता होगा ।

--अंजुम लखनवी
3 वर्ष पहले
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