पल-पल संचित होकर समय बना
सृष्टि के निर्माण,
सभ्यताओं के उदय तथा
विध्वंस की घटनाओं का साक्षी
कालचक्र घूमता ही रहता कभी थमता नहीं।
हर लम्हा नये अनुबंधों पर छोड़े अपनी दस्तख़त
अद्धभुत, दशों दिशाओं में
कर्मगति पर दृष्टि पैनी अपनी रखता
युगों के पन्नों पर स्मृतिचिन्ह छोड़ बढ़ता।
पछपात करता नहीं, किसी से कभी
भगवान राम, राजा हरिश्चंद्र, या कोई रंक
मृत्युलोक पर विहंसता, संवदेनहीन जब पाषाण बन
कसता डोर जब, कालचक्र का फन्दा।
मिथ्या नहीं, तिलस्मि है समय का पहिया
मुठ्ठी में बंद नहीं, विचित्र नियति का खेल है
हमसाया बन जो चले
सफ़र उसका आसाँ और मुकम्मल होता।
कालचक्र लिखें, भाग्य की लकीरें
ज़माने की लकीरें हर पल, हर क्षण...
अंजना प्रसाद
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