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एकांत का घर

Anita Chaturvedi

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            एकांत का घर
        
                                                    
                            

जिसका कोई नहीं जग में,
उसका एक घर हो—
नीरव नभ की छाँह तले
स्वप्नों का सुंदर स्वर हो।

सूनी-सी उस देहरी पर
संध्या दीप जलाए,
मंद पवन के मृदु स्पर्शों में
मन अपना दुःख गाए।

न कोई पदचाप प्रतीक्षित,
न कोई आहट आए,
फिर भी चंद्र-किरण खिड़की से
चुपके भीतर आए।

अंबर की नीलिम आँखों में
वह अपना दुःख निहारे,
तारों की झिलमिल में जैसे
बिखरे हों सुख सारे।

आँगन में झरते पत्तों-सा
जीवन मौन पड़ा हो,
फिर भी उस सूने घर में
उसका अपना जग सारा हो।

दीवारों की निस्तब्धता में
कितनी कथाएँ सोईं,
एकाकी मन की वीणा पर
कितनी स्मृतियाँ रोईं।

प्रभात-किरण जब आकर
उसकी चौखट चूमे,
सूने पलकों पर आशा के
दो नन्हे सपने झूमें।

न चाहिए जग का वैभव,
न संबंधों का मेला,
बस इतना हो—
जब मन थक जाए,
तो मिल जाए अपना अकेला
एक कोमल-सा घर।

जहाँ न प्रश्न किसी का हो,
न उत्तर देने का भय,
जहाँ स्वयं से मिल सके मन,
जहाँ मौन बने परिचय।

जिसका कोई नहीं जग में,
उसका इतना अधिकार रहे—
ईंटों की उस छोटी छत में
उसका अपना संसार रहे।

और जब रजनी गहरी होकर
नीरवता में ढल जाए,
उसके सूने घर की खिड़की पर
चंद्र-किरण मुस्काए—

“तू अकेला नहीं,
तेरे संग यह गगन,
यह पवन, यह चाँद, ये तारे हैं;
तेरे मौन के सहचर
ये सारे हैं…”
- अनिता चतुर्वेदी
2 महीने पहले
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