कोई वजह नहीं थी मगर भागते रहे
कुछ भी घटा बढ़ा नहीं पर नापते रहे
वो धुन थी सुनाने की, कि बहुत देर तक
आता नहीं था कुछ मगर अलापते रहे
फिर आज रात नींद बहुत देर से आई
कुछ बात नहीं खास मगर जागते रहे
हम सर्द फिजाओं की दहशत में यूं आए
बुझ गई आग राख फिर भी तापते रहे
वो जख्म भर गए मगर अहसास रह गए
हम आज तक भी जिस्म अपने ढांपते रहे
जो जिंदगी की दौड़ कभी जीत न पाए
अपनी तसल्लियों के लिए हांफते रहे
मंजर था बर्फबारी का दहशत से ठंड से
सूरज निकल गया वो मगर कांपते रहे