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सूरज निकल गया वो मगर कांपते रहे

Anil Pandey

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कोई वजह नहीं थी मगर भागते रहे
        
                                                    
                            
कुछ भी घटा बढ़ा नहीं पर नापते रहे
वो धुन थी सुनाने की, कि बहुत देर तक
आता नहीं था कुछ मगर अलापते रहे
फिर आज रात नींद बहुत देर से आई
कुछ बात नहीं खास मगर जागते रहे
हम सर्द फिजाओं की दहशत में यूं आए
बुझ गई आग राख फिर भी तापते रहे
वो जख्म भर गए मगर अहसास रह गए
हम आज तक भी जिस्म अपने ढांपते रहे
जो जिंदगी की दौड़ कभी जीत न पाए
अपनी तसल्लियों के लिए हांफते रहे
मंजर था बर्फबारी का दहशत से ठंड से
सूरज निकल गया वो मगर कांपते रहे
एक महीने पहले
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