हयाते सफर में, फाजिल थे दरकिनार हुए
जो खुद को सीढ़ियाँ कहते रहे दीवार हुए
यही मुफीद था शक़ की नजर रखना सब पर
निजाम बदला ,तो कई संतरी फरार हुए
आवाम ने सफेदपोशों का पर्दाफाश किया
सभी जो बंद लिफाफे थे वो अखबार हुए
अब जगह वो ढूंढते फिरते हैं मुंह छुपाने को
पाकदामन जो थे दामन वो तार तार हुए
यही मुमकिन है आइने पे भरोसा कर लूँ
कई जमाने हुए किसी शै पे ऐतबार हुए