अनसुलझी सी हो गई है जिंदगी मोहब्बत की पहेलियों में
ख़्वाबों में जिसे सजाया वो डूबी हैं अपनी ही रंगरलियों में
तोड़कर रिश्ते नींदों से, खोये रहते थे जिसके ख़यालों में
वो बेवफा चैन से सोती है बिस्तर ए मखमलियों में।
आँखों की चमक से जिसके,खिले थे फूल दिल की कलियों में
महक उठा था मैं,भँवरों की तरह घूमकर मोहब्बत की चमेलियों में
हाथों में हाथ लिए जिसका टहलते थे शाम ओ शहर
क्या ख़ता हुई कि, भटकते हैं उसके लिए इश्क की गलियों में।
यादों में उसकी गिरते जो आँसू,उबलते हैं चाय की केतलियों में
तोड़े जो गुल थे जुल्फों के लिए उसके,सूखते हैंं आज इंतजार की थैलियों में
जो उल्लास था उसके इश्क के टूटे हुए खडंहरो में
वो खुशियाँ नहीं मिलती उसकी स्मृति की चमकदार हवेलियों में।
- आनंद प्रताप सिंह
इलाहाबाद विश्वविद्यालय
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