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मोबाइल का क्लेश

अनिल कुमार

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            इस शरीर का अंग न होकर, अंगों से प्रिय लगता भाय
        
                                                    
                            
बात करूँ मैं मोबाइल की, ड्रग से भी घातक लत आय

हर घर में बस यही क्लेश है, आज तुम्हें हम रहे बताय
बच्चा बूढ़ा युवा सभी के, प्राण उसी में रहे समाय

बतियाने का सहज जो कल्चर, मोबाइल ने दिया भुलाय
चार लोग परिवार में रहते, अनजाने से पड़े दिखाय

बेटा फोन के गेम में उलझा, माता खाने को चिल्लाय
बाप से बात तभी है होती, जब बचता न कोई उपाय

पोस्ट बॉक्स का सिंबल भैया, बच्चों से समझा न जाय
क्यूरोसिटी पत्र पढ़ने की, मोबाइल ने लिया चुराय

इंस्टाग्राम का चक्कर भैया, असली नकली गया भुलाय
घड़ी रेडियो टेलीविजन को, दो इसने औकात दिखाय

समय से पहले मोटा चश्मा, आँखें सूखी रही दिखाय
ईयर फोन ने कानों में भी, मीठा जहर दिया मिलाय

मात-पिता को मोबाइल ने, है दीना रिप्लेस कराय
याद नहीं आती अब उनकी, मोबाइल ने दिया भुलाय

नहीं बुराई है ये इसकी, ये विज्ञान की सीमा आय
उसका केवल काम है इतना, दे मनुष्य का साथ निभाय

नहीं चेतना उसमें भैया, तुम अपनी खुद लेव जगाय
कभी आपातकाल पड़ जाये, लागे सुनो सहोदर भाय

पढ़ने लिखने सफ़र में भैया, देता सच्चा साथ निभाय
समय फिक्स तुम इसका कर लो, अपने से चलता है नाय

निर्भरता को धीरे-धीरे, तब ही तुम पाओगे घटाय
ऑटोमेटिक स्विच ऑफ का देव इसे तुम पाठ सिखाय
 
एक घंटा पहले
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