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चाहो तो फांसी लटका दो

Amit premshanker

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            चाहो तो फांसी लटका दो यार नहीं मैं मानूंँगा
        
                                                    
                            
निकल पडा़ हूँ समर भूमि में हार नहीं मैं मानूंँगा।
क्षमा याचना नहीं होगा चाहें ये जान चली जाए
विजयी होकर लौटूंँगा चाहें ये शीश बली जाए।।

लाचार विवश जनता पर तुम वर्दी का रौब जमाते हो
कानून का रखवाला बन तुम घूस चूस कर खाते हो
चंद नोटों के खातिर तुम जनता को खूब घसीटे हो
बेगुनाहों को भी थाने बांध बांध के पिटे हो ।।

न्याय मांँगने दर पे तेरे जब भी जनता आती है
माँ बहन की गाली खाकर बोलो कैसे सहती है
होकर विवश मुझे तुम्हें अंकुश लगाना पड़ रहा
तुम जैसे हैवानो को लगाम लगाना पड़ रहा।

जैसी तेरी भाषा है अब वैसे ही समझाएंगे
कानून के भी नीति नियम और धाराएं समझाएंगे
बहुत सहे हैं जुल्म तुम्हारे माफी नहीं मैं मागूँगा
चाहो तो फांसी लटका दो यार नहीं मैं मानूंँगा ।।
- अमित प्रेमशंकर
एक महीने पहले
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