आज़ादी का तराना - स्लोगन के अंतर्गत जिन पाठकों की कविताएं मिलीं।
हाशिम रज़ा जलालपुरी
आज़ादी के फूल खिलाये, भारत के जाँबाज़ों ने
अपने लहू से दीप जलाये, भारत के जाँबाज़ों ने
जब भी उठीं दुश्मन की निगाहें, भारत की सरहद की तरफ
हिम्मत के सूरज चमकाये, भारत के जाँबाज़ों ने
अंग्रेजों के ज़ुल्म मिटा कर, देश को जब आज़ाद किया
शान से तब परचम लहराये, भारत के जाँबाज़ों ने
हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई, एक बनो और नेक बनो
गीत अहिंसा के भी सुनाये, भारत के जाँबाज़ों ने
जल्लादों के ज़ुल्म के आगे, चूम के फाँसी का तख्ता
नारों से तूफ़ान उठाये, भारत के जाँबाज़ों ने
दुनिया के हर मुल्क से अच्छा, हिंदुस्तान हमारा है
हाशिम यह पैग़ाम सुनाये, भारत के जाँबाज़ों ने
विज्ञापन
उत्तम द्विवेदी
सैनिक हैं सब भाँज रहे भुज आपन भारत के रखवाले।
दुश्मन काँप रहे घर में निज कारण भारत के रखवाले।।
चाँद अकाश चढ़ें हम तो जब पावत भारत के रखवाले।
आरती आज करे जनता सब आवत भारत के रखवाले।
प्रतिभा गुप्ता
आई थी सैंतालीस की प्रभा,
टूटी नींद ज़ंजीरों की।
सूरज बोला छू नभ को —
"अब साँसें हैं तहरीरों की।"
धरती ने चूड़ियाँ पहन लीं,
अम्बर लाया केसरी साज।
चारों ओर बजे घुँघरू,
सपनों ने पहना ताज।
चर्खे की डोरी बोली कुछ,
सुनहरी सी बात कही।
झोंपड़ियों से निकले तारे,
नभ ने डोली साथ सजी।
खेतों में हर गीत खिले,
हाथों ने लिख दी कहानी।
हरित क्रांति ने हल थामा,
श्वेत ने दूध की रवानी।
जो सपना था सूनी आँखों का,
अब मेट्रो बन दौड़ रहा।
कल तक जो चुपचाप रहा था,
वो गाँव आज बोल रहा।
सीमा पर जो वीर लड़े,
विज्ञान बना वह गौरवगान।
कोई रक्षा-व्रत में रमा,
कोई बना नव सृजन महान।
सरहद बोली — “मैं चट्टान हूँ,”
सागर बोला — “मेरा मान।”
हिमगिरि गरजा — “वीरों की,
मैं बनता हूँ गौरव-थान!”
मंगल तक जब पहुँचे पाँव,
धरती ने नभ को गढ़ डाला।
गगन बना अब कर्मभूमि,
सपना कोई नहीं है काला।
तिरंगा बोला गर्व भरे स्वर —
“मैं बस रंगों की बात नहीं,
हर नन्हीं आँखों में देखूँ
सपनों की बरसात कहीं।”
बीते सावन उन्नासी हैं,
हर बूँद में बलिदान भरा।
आँसू बन जो बरसे थे,
वो लहू बना, पहचान खरा।
आँधी में भी दीप जले,
हर साँस में था एक गान।
ये नदियाँ केवल जल नहीं —
ये हैं संघर्षों की उड़ान।
एक स्वप्न नव फिर रच डालो,
जिसमें पीढ़ी देखे मान।
अमृत से भी बढ़कर हो जो —
माटी का सच्चा सम्मान।
नव-सपनों का गढ़ो निर्माण,
उज्ज्वल हो हर एक विहान।
लिखो तुम ऐसा अमर फ़साना —
कि पीढ़ियाँ गाएँ गर्वगान —
"यही है आज़ादी का तराना!"
अर्चना रॉय
मेरे प्यारे नौनिहालो...
अब तुम इस देश को सम्भालो,
ना बिखरने दो गुलिस्तां को
ना उजड़ने दो इस फिज़ां को
बडे जतन से है पाया
आज़ाद हिन्दोस्तां को !!
कितनी कुर्बानियां दीं हैं
भारत मां के बेटों ने
हरी धरा भी लाल हुईं
वीर सपूतों के लहू से..
मान रखना उन शहीदो की
शान रखना इस तिरंगे की...
आज़ादी का बिगुल जो बजा है
ना मद्धम पडे धुन इसकी ...
स्वर्निम इतिहास हमारा
सारे जहां से प्यारा,
पावन भूमि हमारी
हर कण सोने सा न्यारा..
अब बागडोर है इसकी
बच्चों तुम्हारे हाथों
देखो जतन से रखना
ना आंच आने देना
चाहे कोई तूफ़ान हो !!
बुनियाद अपने भारत की
फौलाद बनाए रखना
सोने की चिडिया को यूं ही
हर पल सजाए रखना !!
आज़ादी का तराना
हर दम गुनगुनाना
गुलाम ना हो कोई
तन से चाहे मन से
आज़ादी का असली मतलब
हर एक को बताना ...
फ़रमान कुरावली
न तो कोई फसाद न दंगा दिखाई दे
ज़मज़म के साथ में सदा गंगा दिखाई दे
सच पूछिए तो दिल की यही आरज़ू है बस
हाथों में सबके सिर्फ तिरंगा दिखाई दे!