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है कोई मेरा जो ताप नापै मुक्तक

AL Mishra

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            है कोई मेरा जो ताप नापै।
        
                                                    
                            
कड़क सर्दी में हाड़ कापै।।

दिनकर भी कापै।
हिमकर भी कापै।।

उडगन की कोई मिशाल नहीं।
अग्नि में भी अब ताप नहीं।।

शैया भी अब तो हिम में डूबी।
अब तो लगता जीवन नैया डूबी।।

है कोई मेरा जो ताप नापै।
कड़क सर्दी में हाड़ कापै।।

कवि : अशर्फी लाल मिश्र ,अकबरपुर ,कानपुर।


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6 वर्ष पहले
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Chandra prakash

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