था मातु पिता का पुण्य मेरे साथ,
आशीष जनक मातु सुनयना का।
दोनों कर उठाय लीन्हा धनु पिनाक।
पाय आशीष सम्मुख बैठे गुरुवर का।।
राजा जनक सदा न्याय धुरी,
मिथिला में होता अन्याय नहीं।
मेरे गुरुवर जँह होंय उपस्थित,
हो सकता शिव अपमान नहीं।।
भगवन! ज्योंही धनु प्रत्यँचा खींची,
पिनाक धनु हो गया था दो टूक।
तभी सीय सखियन मुख से सुना,
हुआ शिव व्रत पूरा जनक लली का।।
भगवन! हम हैँ शिव सूर्य उपासक,
मन में कभी शिव अपमान नहीं।
सब विधि जाना जब जमदाग्नि राम,
मिला शिव अपमान का संकेत नहीं।।
राजा जनक के संकल्प में भी,
शिव अपमान का संकेत नहीं।
जान सुयोग्य वर चयन संकल्प,
जामद्गन्य अब हो गये थे संतुष्ट।।