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बचपन की यादें

Akanksha Singh

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            खो गया है वो आंगन अब
        
                                                    
                            
गूंजती थी जहां किलकारियां तब
भर जाता था नानी का घर
साथ होते थे जब हम सब
बिछती थी खटिया आंगन में
साथ होते थे एक साथ सब
सारी दोपहर हम शोर मचाते
अपनी हरकतों से सबको सताते
फिर नानी करती गुस्सा हम पर
फिर भी दिखता था हमको प्यार उस पर
समय का पता ही न चलता था
कि कब सूरज ढलता था और निकलता था
रह गई हैं अब यादें बस
नहीं आयेंगे वो गुजरे पल
काश ला पाती उन पलों को दोबारा
और जी लेती फिर वो बचपन सारा।

- आकांक्षा सिंह
2 वर्ष पहले
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