पूछ रहा है आज समय यह,
कहाँ गया मानव का मान?
कैसे प्रगति-पथ पर चलकर
भूल गया अपनी पहचान?
विज्ञानों की ऊँची चोटी,
नभ में उड़ते अगणित यान,
पर क्यों मानव के अंतस में
उठता रहता मौन तूफ़ान?
दजला-तट के वे मधुर गीत,
सभ्यता के गौरवगान,
आज धुएँ की काली चादर,
मौन खड़ा है आसमान।
बग़दादों के पथ रक्तरंजित,
दमिश्क हुआ इतिहास-विहीन,
गाज़ा का बचपन पूछ रहा,
क्या युद्धों का यही प्रवीण?
काबुल की निस्तब्ध वादी
अब भी प्रश्न सुनाती है,
सत्ता की अंधी महत्वाकांक्षा
जनता को क्यों भरमाती है?
तेहरान की संध्या उदास,
मन में अनगिन संशय हैं,
शक्ति-संतुलन की राजनीति में
मानवता के ही भय हैं।
कलम उठाकर एक पथिक ने
युग का सत्य लिख डाला,
विजय-घोष के पीछे छिपा
अश्रु-सागर दिखला डाला।
उसने देखा,
सीमा पर अडिग जवान,
नेत्रों में संकल्प प्रखर,
किन्तु घर की चौखट पर माता
पीती रहती मौन ज़हर।
उसने देखा,
शरणार्थी का टूटा घर,
बच्चे का बिखरा विश्वास,
रोटी से पहले जीवन माँगे
हर थरथराती श्वास।
इतिहासों की धूल झटककर
फिर से पढ़ लो यह अध्याय,
घृणा की ज्वाला बोने वाले
अपने ही घर जलाते पाए।
आज पुनः जग सिहर रहा है,
तनावों का घना कुहासा,
अमेरिका और ईरान के बीच
बढ़ता जाता अविश्वास।
मिसाइलों की गर्जन सुन
मरुस्थल का मन काँप उठा,
होरमुज़ की संकरी धारा में
विश्व-वाणिज्य भी थम-सा उठा।
एक निर्णय की तीखी जिद
करोड़ों भाग्य उछाल रही,
शांति-सभा के ऊँचे स्वर भी
भीतर-भीतर टाल रहे।
नेता कहते "हम शांति के उपासक हैं",
किन्तु शस्त्रों की यह होड़
कितनी गहरी आशंकाएँ हैं!
किस माँ से पूछोगे जाकर
पुत्र-वियोग का संताप?
किस पत्नी के मौन नयन में
पढ़ पाओगे विरह-प्रलाप?
किस बहना की सूनी राखी
उत्तर माँगेगी तुमसे?
किस बालक की बुझती आँखें
उत्सव माँगेंगी तुमसे?
धर्म न हिंसा का शिक्षक है,
न प्रतिशोध महान कभी,
मानव होकर मानव का वध
मानव का सम्मान नहीं।
राम तुम्हारे, रहीम तुम्हारे,
ईसा, बुद्ध महान,
सबने करुणा का ही पथ
दिया जगत को सदा विधान।
सत्य अगर निर्बल हो जाए,
न्याय भय से झुक जाए,
धन के सम्मुख नीति बिके तो
राष्ट्र कहाँ फिर टिक पाए?
युद्धों से इतिहास मिलेंगे,
पर मन नहीं मिल पाएँगे,
घृणा के बीज अगर बोओगे,
तो शूल ही घर आएँगे।
शक्ति वही जो प्राण बचाए,
नीति वही जो साथ चले,
राज वही जो अश्रु पोंछे,
धर्म वही जो हाथ मिले।
वीरता का अर्थ न केवल
रण में शत्रु-वध करना है,
सबसे कठिन विजय तो अपने
क्रोध-विषाद पर करना है।
रात्रि घनी हो, घोर तिमिर हो,
फिर भी दीप जलाना है,
मानव होकर इस पृथ्वी को
मानव-लोक बनाना है।
यही शक्ति उस रात्रि की है,
यही अमर संदेश प्रखर,
राज्य बदलते रहते जग में,
मानवता रहती अक्षय-अमर।
- डी. के. कनौजिया