सुशांत... सुशांत... सुशांत...
सबकी जुबां यही कहानी में लगी है।
मेरी लेखनी भी सुशांत के लिये जगी है!
आज अमर कहानी लिखी जायेगी यहाँ,
हाथ को एक निशानी हाथ आज लगी है।
जब किसी को भी सफलता की सीढियाँ चढ़नी होती है,
तब कई बार इंसानी आत्मा फ़फ़क-फ़फ़ककर रोती है।
हम होते हैं, सफलता और असफलता साथ हमारे।
बाद में सुशांत के जैसी कहानियों में बहस ही होती है।
ज्ञान देने वाले लोग तब कहाँ जाते हैं
जब आदमी के दिल में तनाव होती है?
मानवता होती है शर्मसार हर पल आज,
अच्छी आत्मा आज दिन-रात रोती है।
आधुनिक परिवेश में सफल होना अलग बात है,
और अंदर से प्रसन्नचित होना तो अलग बात है।
लोहा तो लोहा है और मोती तो मोती होती है,
बात दिखावा और हकीकत में अलग ही होती है।
यदि मैं इसे अपने आप पे लागू करूँ,
तो जीते जी दूसरी राह में जीवन धरूँ !
आखिर आत्मा बेचैन है, करूँ तो क्या...
अपनी कहानी की अंतिम पक्ष किधर धरूँ?
मेरी कहानी विकास और अविकास में फसी है,
दुश्मनों की तो दिन-रात एक जस ही फटी है।
माँ-बाबूजी की तो मैं कुछ नहीं कह सकता हूँ...
पर, मेरी तरक्की से मेरे घरवालों की ही फटी है!
सुशांत के ऊपर बहस करने वालों बताओ!
कभी अवतारी की कुटिया को तो आ जाओ!
तुम्हें मैं असत्य और सत्य में भेद कर दिखाऊंगा।
तुम्हारी असलियत आज तुम्हारे सामने मैं लाऊं...
अभिषेक अवतारी
मंझरिया, मठिया, लौरिया
पश्चिमी चम्पारण
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