गुम हैं,
गुम हैं!
पक्षी के स्वर।
आकाश के कड़कती धूप से नहीं,
अत्यधिक वर्षा से नहीं,
गुम हैं,
पक्षी के स्वर!
मनुष्यों के आतंक से,
बिना किसी चाह के,
गुम हो रही हैं बोलियाँ,
गुम हो रही हरीयाली,
गुम हैं,
पक्षी के स्वर!
रंगों के रंग थे कभी,
सुबह की घड़ी थे कभी,
दोपहर से शाम तक,
दिशा के संदेश थे कभी।
गुम हैं,
पक्षी के स्वर।
बिजली के कतरों से,
हवाओं की लहरों से,
मनुष्य के प्रकोप से,
आतंक की वृद्धि से।
गुम हैं,
पक्षी के स्वर।
गुम हैं,
पक्षी के स्वर।