जबसे मैने तुझे दिल में जो बसा रक्खा है ।
जान को मैरी निशाने पे लगा रक्खा है ।।
जबसे हस्ती तिरी आबाद की है तब ही से ।
अपनी हस्ती को तो बर्बादी पे ला रक्खा है ।।
जबसे वलियों से फ़रिश्तों से सुना है तबसे ।
नाम मैंने तिरा सीने में दबा रक्खा है ।।
तेरी इस हुस्न परस्तिश में मिरे अलमालिक ।
मैंने लकड़ी की तरह ख़ुद को जला रक्खा है।।
मैंंने जब से कलिमा तेेरा पढ़ा है तब से ।
इस ज़माने ने तो तूफ़ान उठा रक्खा है ।।
बद दुआयें ज़मीं से आसमाँ तक जाती हैं l
कुछ "अनीस"ऐसा ही सूफ़ी ने बता रक्खा है ।।
-अनीस बांसवाड़ा