यह धरती
संन्यास की शुष्क गुफाओं में
नहीं बची हुई है
न ही विराग के निर्वात में
अब तक साँस ले रही है,
यह जीवित है तो
उन हथेलियों की तपन से
जो खून-पसीना एक कर
रात के अँधेरों से भिड़ती रहीं
उन कंधों की थकान से
जो स्वयं टूटकर भी
धरती को टूटने नहीं देते।
प्रकृति भी
उसी मनुष्य के सामने झुकती है
जो उद्यम को अपना धर्म बनाता है
जो ऊसर भूमि में भी
हरियाली के स्वप्न बो देता है।
इसलिए
कवि की वाणी में
वैराग्य नहीं,
कर्म का शंखनाद गूँजता है।
वह जानता है...
अकर्मण्यता
मनुष्य की सबसे बड़ी पराजय है
और भोग में डूबा हुआ जीवन
धीरे-धीरे
अपने ही भीतर मर जाता है।
एक सर्जक
जब समाज की कुव्यवस्थाओं को
देखता और परखता है
तो उसकी आत्मा मौन नहीं रहती
वह रूढ़ मान्यताओं पर
वज्र की तरह प्रहार करता है
क्योंकि उसे अंधकार से घृणा है
पर वह उससे भयभीत नहीं।
युगचेता मनुष्य जानता है...
धरती को बदलने के लिए
केवल विचार नहीं
कर्म की ज्वाला चाहिए।
मोक्ष
किसी वन की नीरवता में नहीं
उस क्षण जन्म लेता है
जब एक मनुष्य
अपनी सामर्थ्य से
दूसरे के जीवन में प्रकाश भर देता है
केवल अपने लिए जीना
पशुता का लक्षण है
मनुष्य वही है
जो दूसरों के दुःख में
अपने हाथों को दीपक बना दे।
आओ...
हम संन्यास नहीं
संघर्ष चुनें,
वैराग्य नहीं...
मानवता का श्रम चुनें,
और इस धरती पर फैले
हर अंधकार से कह दें--
अब समय कर्मवीरों का है
अब समय उन लोगों का है
जो अपने श्रम और साहस से
समस्त धरती को
बदल देने का आत्मविश्वास रखते हैं।
- सलमान खान ‘ अपरिचित ’