अंगड़ाई पर अंगड़ाई लेती है रात जुदाई की
तुम क्या समझो तुम क्या जानो बात मेरी तन्हाई की
कौन सियाही घोल रहा था वक़्त के बहते दरिया में
मैंने आँख झुकी देखी है आज किसी हरजाई की
वस्ल की रात न जाने क्यूँ इसरार था उन को जाने पर
वक़्त से पहले डूब गए तारों ने बड़ी दानाई की ।
यूं तो क़तील शिफ़ाई के कलाम को गुजरे ज़माने के मशहूर ग़ज़ल गायक जगजीत सिंह ने खूब गाया है लेकिन अंगड़ाई पर अंगड़ाई लेती है रात जुदाई की, मैंने पहली बार अपने समय के जाने-माने फ़नकार नुसरत फ़तेह अली खान की आवाज में सुनी। जब कोई कलाम किसी मशहूर गायक के जुबान के रास्ते अवाम तक पहुँचने लगे तो समझिए गायक की आवाज के साथ-साथ वो शायर भी लोगों तक पहुँच रहा है। यही कारण है कि ये मशहूर ग़ज़ल सुनने के बाद से क़तील साहब को पढ़ने-जानने की इच्छा हुई। क़तील शिफ़ाई ऐसे शायर हैं कि उनको पढ़ने के बाद आपको शब्दों का ऐसा सहारा मिल जाता है कि अपने नज़दीकी और निजी रिश्तों में जब भी अभिव्यक्ति की मुश्किलों से गुजरेंगे तो क़तील के पास जाने मन करेगा।
अपने होठों पर सजाना चाहता हूँ
आ तुझे मैं गुनगुनाना चाहता हूँ
कोई आंसू तेरे दामन पर गिराकर
बूंद को मोती बनाना चाहता हूँ
थक गया मैं करते-करते याद तुझको
अब तुझे मैं याद आना चाहता हूँ
छा रहा है सारी बस्ती में अंधेरा
रोशनी को घर जलाना चाहता हूँ
आखरी हिचकी तेरे ज़ानो पे आये
मौत भी मैं शायराना चाहता हूँ।
'चंद्रकांता' नाम की फिल्म अभिनेत्री से क़तील साहब का प्रेम था और यह प्रेम बहुत कम समय तक चला। साल-डेढ़ साल में ही टूट गया। लेकिन इसके बाद उनकी शायरी में भी बदलाव आया। मोहब्बत को कितनी मजबूती से वे अपने शायरी में ढालते हैं-
प्यार तुम्हारा भूल जाऊँ, लेकिन प्यार तुम्हारा है
ये इक मीठा ज़हर सही, ये ज़हर भी आज गंवारा है।
वैसे तो क़तील मोहब्बतों के शायर थे लेकिन शायर की कल्पनाओं को किसी हद में कैद नहीं किया जा सकता और इसीलिए वे सिर्फ रोमांटिक शायरियों तक सीमित नहीं हुए, सामाजिक-राजनीतिक मामलाेंं पर भी उन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से टिप्पणी की। क़तील साहब भारत-पाक संबंधों पर किस तरह तंज करते हैं, इसकी एक झलक देखिए -
हमको आपस में मोहब्बत भी नहीं करने देते
इक यही ऐब है इस शहर के दानाओं में
कोई शायर मोहब्बत में रहते हुए जितना शायराना होता है यकीन मानिए कि वह चोट खाने के बाद उससे अधिक हो जाता है, और जख्मी दिल अपने जज़्बातों को जब शायरी में ढालता है तब उसका दूसरा पक्ष सामने आता है-
अपनी हदों में रहिए कि रह जाए आबरू
ऊपर जो देखना है तो पगड़ी संभालिये
ख़ुश्बू तो मुद्दतों की ज़मीं-दोज़ हो चुकी
अब सिर्फ़ पत्तियों को हवा में उछालिए
सदियों का फ़र्क़ पड़ता है लम्हों के फेर में
जो ग़म है आज का उसे कल पर न टालिए
आया ही था अभी मिरे लब पे वफ़ा का नाम
कुछ दोस्तों ने हाथ में पत्थर उठा लिए
क़तील साहब कहते थे कि उनके वालिद चाहत थे कि किसी सूरत में मैं शायर न बनूं लेकिन बिगड़ते-बिगड़ते मैं एक दिन शायर बन ही गया।
कट गया वक़्त मुस्कुराहट में
क़हक़हे रूह को पसंद न थे
वो भी आँखें चुरा गए आख़िर
दिल के दरवाज़े जिन पे बंद न थे
सौंप जाता है मुझ को तन्हाई
जिस पे दिल एेतबार करता है
बनती जाती हूं नख़्ल-ए-सहराई
तू ने चाहा तो मैं ने मान लिया
अपनी बेचैनियों और ख़यालों में जब क़तील खुद के अनुभवों और जज़्बातों को मिला देते हैं तब उनकी कलम या ज़ुबान से कोई शायरी फूटती है तब वो ज़्यादा यथार्थपरक हो जाती है, और पाठक मुरीद हाे जाता है-
जब भी तन्हा मुझे पाते हैं गुज़रते लम्हे
तेरी तस्वीर सी राहों में बिछा जाते हैं
मैं कि राहों में भटकता ही चला जाता हूँ
मुझ को ख़ुद मेरी निगाहों से छुपा जाते हैं
मेरे बेचैन ख़यालों पे उभरने वाली
अपने ख़्वाबों से न बहला मेरी तन्हाई को
जब तिरी साँस मिरी साँस में तहलील नहीं
क्या करेंगी मिरी बाँहें तेरी अंगड़ाई को ।