'एकता' और 'भाईचारा' किसी प्रगतिशील समाज की मूलभूत ज़रूरत है। लेकिन सामाज विभिन्न जातियों और समुदायों में बंटा हुआ है, कई बार ये वजहें कड़ुवाहट पैदा करती हैं। ऐसी स्थितियों में ही सजग रहने की ज़रूरत होती है। शायरों ने 'एकता' और 'भाईचारा' जैसे बुनियादी इंसानी जज़्बातों को ख़ूबसूरत अल्फ़ाज़ों से नवाजा है।
तू हिन्दु बनेगा ना मुसलमान बनेगा
इन्सान की औलाद है इन्सान बनेगा
- साहिर लुधियानवी
सात संदूक़ों में भर कर दफ़्न कर दो नफ़रतें
आज इंसाँ को मोहब्बत की ज़रूरत है बहुत
- बशीर बद्र
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वो दिलों में आग लगाएगा मैं दिलों की आग बुझाऊंगा
उसे अपने काम से काम है मुझे अपने काम से काम है
- बशीर बद्र
न किसी की आँख का नूर हूँ न किसी के दिल का क़रार हूँ
जो किसी के काम न आ सके मैं वो एक मुश्त-ए-ग़ुबार हूँ
- बहादुर शाह जफ़र
मेरा मज़हब इश्क़ का मज़हब जिस में कोई तफ़रीक़ नहीं
मेरे हल्क़े में आते हैं 'तुलसी' भी और 'जामी' भी
- क़ैशर शमीम
सब को उल्फ़त के मरकज़ पे लाऊँगा मैं
एकता का दिया फिर जलाऊँगा मैं
- कँवल डिबाइवी
मेरी दुनिया में न पूरब है, न पच्छिम कोई
सारे इनसान सिमट आये खुली बाहों में
- कैफ़ी आज़मी
मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना
हिन्दी हैं हम वतन है हिन्दोस्ताँ हमारा
- अल्लामा इक़बाल
सभी थे एकता के हक़ में लेकिन
सभी ने अपनी अपनी शर्त रख दी
- दीपक जैन दीप
हमारा ख़ून का रिश्ता है सरहदों का नहीं
हमारे ख़ून में गँगा भी चनाब भी है
- कँवल ज़ियाई
मुझ में थोड़ी सी जगह भी नहीं नफ़रत के लिए
मैं तो हर वक़्त मोहब्बत से भरा रहता हूँ
- मिर्ज़ा अतहर ज़िया