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नोबल पुरस्कृत कृति गीतांजलि से रबीन्द्रनाथ ठाकुर की 10 कविताएं

काव्य डेस्क

Kavya Charcha
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कितने अनजानों से तुमने करा दिया मेरा परिचय 

कितने अनजानों से तुमने करा दिय मेरा परिचय
कितने पराए घरों में दिया मुझे आश्रय।
बंधु, तुम दूर को पास
और परायों को कर लेते हो अपना।
अपना पुराना घर छोड़ निकलता हूँ जब
चिंता में बेहाल कि पता नहीं क्या हो अब,
हर नवीन में तुम्हीं पुरातन
यह बात भूल जाता हूँ।

बंधु, तुम दूर को पास
और परायों को कर लेते हो अपना।
जीवन-मरण में, अखिल भुवन में
मुझे जब भी जहाँ गहोगे,
ओ, चिरजनम के परिचित प्रिय!
तुम्हीं सबसे मिलाओगे।
कोई नहीं पराया तुम्हें जान लेने पर
नहीं कोई मनाही, नहीं कोई डर
सबको साथ मिला कर जाग रहे तुम-
मैं तुम्हें देख पाऊँ निरन्तर।
बंधु, तुम दूर को पास
और परायों को कर लेते हो अपना।
 

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अंतर मम विकसित करो...

अंतर मम विकसित करो
हे अंतरयामी!
निर्मल करो, उज्ज्वल करो,
सुंदर करो हे!
जाग्रत करो, उद्यत करो,
निर्भय करो हे!

मंगल करो, निरलस नि:संशय करो हे!
अंतर मम विकसित करो,
हे अंतरयामी।

सबके संग युक्त करो,
बंधन से मुक्त करो
सकल कर्म में संचरित कर
निज छंद में शमित करो।

मेरा अंतर चरणकमल में निस्पंदित करो हे!
नंदित करो, नंदित करो,
नंदित करो हे!

अंतर मम विकसित करो
हे अंतरयामी!

अपने सिंहासन से उतर कर...

अपने सिंहासन से
तुम आ गए उतरकर-
मेरे एकाकी घर के दरवाजे पर
नाथ, खड़े हो गए ठिठककर।

बैठ अकेला मन-ही-मन
गाता था मैं गान,
तुम्हारे कानों तक पहुँचा वह सुर,
तुम आ गए उतरकर-
मेरे एकाकी घर के दरवाजे पर
नाथ, खड़े हो गए ठिठककर।

तुम्हारी सभा में कितने ही गुणी
कितने ही हैं गान
मिला तुम्हारा प्रेम, तभी गा सका आज
यह गुणहीन भी गान।

विश्व-तान के बीच उठा यह
एक करुण सुर।
लेकर हाथों में वर-माला
तुम आ गए उतरकर-
मेरे एकाकी घर के दरवाजे पर
नाथ खड़े हो गए ठिठककर।

प्रचंड प्रकाश बन आओ...

जीवन जब सूख जाए
करुणा-धारा बनकर आओ।
सकल माधुर्य लगे छिपने,
गीत-सुधा-रस बरसाओ।

कर्म जब लेकर प्रबल आकार
गरजकर ढक ले चार दिशाऍं
हृदय-प्रांत में, हे नीरव नाथ,
दबे पॉंव आ जाओ।

स्वयं को जब बनाकर कृपण
कोने में पड़ा रहे दीन-हीन मन
द्वार खोलकर, हे उदार-मन,
राजसी ठाठ से आओ।

वासना जब विपुल धूल से
अंधा बना अबोध को छले
अरे ओ पवित्र, अरे ओ अनिद्र
प्रचंड प्रकाश बन आओ।

वहन कर सकूँ प्रेम तुम्हारा...

वहन कर सकूँ प्रेम तुम्हारा
ऐसी सामर्थ्य नहीं।

इसीलिए इस संसार में
मेरे-तुम्हारे बीच
कृपाकर तुमने रखे नाथ
अनेक व्यवधान-
दुख-सुख के अनेक बंधन
धन-जन-मान।
ओट में रहकर क्षण-क्षण
झलक दिखाते ऐसे-
काले मेघों की फॉंको से
रवि मृदुरेखा जैसे।

शक्ति जिन्हें देते ढोने की
असीम प्रेम का भार
एक बार ही सारे परदे
देते हो उतार।
न रखते उन पर घर के बंधन
न रखते उनके धन
नि:शेष बनाकर पथ पर लाकर
करते उन्हें अकिंचन।
न व्यापता उन्हें मान-अपमान
लज्जा-शरम-भय।

अकेले तुम सब कुछ उनके
विश्व-भुवनमय।
इसी तरह आमने-सामने
सम्मुख तुम्हारा रहना,
केवल मात्र तुम्हीं में प्राण
परिपूर्ण कर रखना,
यह दया तुम्हारी पाई जिसने
उसका लोभ असीम
सकल लोभ वह दूर हटाता
देने को तुमको स्थान।
8 वर्ष पहले
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