विज्ञापन

पद्मश्री प्रसून जोशी : एक कवि जो बना एड गुरु

काव्य डेस्क

Kavya Charcha
विज्ञापन
                                    
                     
                                                  मशहूर गीतकार, कवि, लेखक, पटकथा लेखक, एड गुरु और विज्ञापन जगत की मशहूर शख़्सियत और अब सेंसरबोर्ड के अध्यक्ष प्रसून जोशी। उनकी शख़्सियत के बहुत आयाम हैं और उनकी प्रतिभा के हर आयाम ने लोहा मनवाया है। 

प्रसून का जन्म उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले के दन्या गांव में 16 सितंबर 1968 को हुआ। उनके पिता डी.के. जोशी शिक्षा विभाग में अधिकारी थे। उनकी शुरुआती शिक्षा गोपेश्वर और नरेंद्रनगर गढ़वाल में हुई। भौतिकशास्त्र में ग्रेजुएशन और पोस्ट ग्रेजुएशन करने के बाद इंस्टीट्यूट ऑफ़ मैनेजमेंट ग़ाज़ियाबाद से मैनेजमेंट की पढ़ाई की। एमबीए करने के बाद प्रसून 1992 में विज्ञापन की दुनिया से जुड़ गए। प्रसून मूल रूप से कवि हैं। 1996 में उनका पहला एलबम अब के 'सावन आया' निकला। एमएससी और उसके बाद एमबीए की पढ़ाई के बावजूद हिंदी के प्रति उनका लगाव इन पंक्तियों से समझा जा सकता है - 
 
हिन्दी की उँगली पकड़ कर खड़ा हुआ हूँ 
इसी आँगन की मिट्टी में बड़ा हुआ हूँ 
पर माँ को धन्यवाद कौन देता है... 

प्रसून को बचपन से ही साहित्य से लगाव रहा है। प्रसून का कहना है कि प्रकृति  से प्रेम ही व्यक्ति की रचनात्मकता को धार मिलती है। उनके गीतों में लयात्मकता है, गति है। उन्होंने यह साबित किया कि चालू या वल्गर मुहावरों और फूहड़ता के बिना भी मानवीय संवेदनाओं को झकझोरा जा सकता है। ऐसा उन्होंने फ़िल्म 'तारे ज़मीन पर' का गाना 'तुझे सब है पता मेरी माँ' लिखकर साबित भी किया, जिसके लिए उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार और फ़िल्मफेयर पुरस्कार भी मिला। 2008 में फ़िल्म फ़ना के गीत 'चाँद सिफारिश जो करता हमारी' के लिए भी फ़िल्मफेयर पुरस्कार मिला। 

प्रसून जोशी के गीतों और विज्ञापनों में पहाड़ और प्रकृति का विशेष स्थान रहता है। उन्होंने अपने कई गीतों और विज्ञापनों में पहाड़ का चित्रण करने के साथ ही यहां के परिवेश को संजोया है। कुछ साल पहले अल्मोड़ा में अमर उजाला से बातचीत में उन्होंने कहा था कि किसी क्षण जब वह अटक जाते हैं तब प्रकृति का सहारा लेकर ही आगे बढ़ते हैं। उनका कहना था कि पहाड़ सबको अपना लेता है और इस अंचल ने उन्हें खुली सोच दी है। 

राजकुमार संतोषी की फ़िल्म 'लज्जा' से उन्हें फ़िल्मों में शुरुआत की। उसके बाद से उन्होंने मौला, ' कैसे मुझे तू मिल गई' 'तू बिन बताए', 'खलबली है खलबली', 'सांसों को सांसों' जैसे मशहूर गाने लिखे। ‘तारे ज़मीन पर’, ‘रंग दे बसंती’, ‘हम तुम’ और ‘फना’ जैसी फ़िल्मों के लिए कई सुपरहिट गाने लिखे हैं. प्रसून ने फ़िल्म लज्जा, आँखें और क्योंकि के लिए संगीत भी दिया। बतौर प्रसून जोशी हवन करेंगे, मस्ती की पाठशाला और ससुराल गेंदा फूल जैसे गीत किसी भी इंसान को थिरकने के लिए मजबूर कर सकते हैं। 
विज्ञापन

प्रसून ने बताया ‘ठण्डा मतलब कोका कोला’

एमबीए करने के बाद प्रसून ने 10 साल एक कंपनी में काम किया। अभी वे अन्तर्राष्ट्रीय विज्ञापन कंपनी 'मैकऐन इरिक्सन' में कार्यकारी अध्यक्ष हैं। इसी कंपनी ने केंद्र सरकार की महात्वाकांक्षी परियोजना 'मेक इन इंडिया' और उनके विदेशी कैम्पेन और जिंगल को डिजाइन किया। ‘ठण्डा मतलब कोका कोला’ एवं ‘बार्बर शॉप-ए जा बाल कटा ला’ जैसे प्रचलित विज्ञापनों के कारण उन्हें अन्तरराष्ट्रीय लोकप्रियता मिली।

प्रसून जोशी को 2006 में वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की सहयोगी संस्था द्वारा 'यंग ग्लोबल लीडर' के ख़िताब से नवाज़ा गया। 2008 में प्रसून को बतौर कान्स ज्यूरी चेयरमैन आमंत्रित किया गया और 2009 में उन्हें कान्स लायन्स अंतर्राष्ट्रीय विज्ञापन महोत्सव में उन्हें 10 सदस्यीय कान्स टाइटेनियम और इंटीग्रेटेड जूरी में नामित किया गया था। प्रसून जोशी 2010 राष्ट्रमण्डल खेलों के शुरुआत और समापन सत्र में श्याम बेनेगल और जावेद अख्तर के साथ तीन सदस्यीय कोर क्रिएटिव सलाहकार समिति में शामिल थे। 

प्रसून जोशी को दो बार सर्वश्रेष्ठ गीतकार के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुका है। ये अवार्ड उन्हें तारे जमीं पर और चिटगॉन्ग फ़िल्मों के गीतों के लिए दिया गया है। इसके अलावा दो बार आइफा अवार्ड्स समेत कई राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुके हैं। 2015 में कला, साहित्य और एडवरटाइजिंग के क्षेत्र में योगदान के लिए उन्हें पद्मश्री से नवाजा गया। 

प्रसून जोशी ने भारतीय पॉप संगीत के क्षेत्र में भी उन्होंने कई हिट एलबम्स दिए। 1999 में 'अबके सावन' नाम का गानों का एलबम आया जिसे शुभा मुद्गल ने गाया था और ये बहुत हिट हुआ था।  2000 में शुभा मुद्गल की ही आवाज़ में एलबम आया 'मन के मंजीरे' जो महिलाओं के स्वप्नों पर आधारित था। ये एलबम भी बहुत हिट हुआ था। मोहित चौहान के बैंड 'सिल्क रूट' के लिए 'डूबा डूबा रहता हूँ' भी जोशी की कलम से निकला था जो बहुत हिट रहा। 

आधुनिक फ़िल्मी गीतों के अटपटे बोल या शब्दों पर प्रसून का कहना है की दर्शक ही इस प्रक्रिया में बदलाव ला सकते हैं। अगर वो ऐसी चीजों को नकार दें तो फिर कौन लिखेगा? प्रसून अपने लेखन में भाषा के प्रति बहुत सतर्क रहते हैं। उनकी भाषा सरल, सुगम्य और सबको समझ में आने वाली होती है। प्रसून का मानना है कि मनोरंजन के लिए आप किसी भी चीज़ से समझौता नहीं कर सकते। 
8 वर्ष पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

sunil kumar

181 कविताएं

View Profile

Anita Chaturvedi

161 कविताएं

View Profile

RATAN KUMAR

578 कविताएं

View Profile