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गोपाल सिंह नेपाली, जिन्होंने चीनी आक्रमण के समय कई ओजपूर्ण गीत लिखे

काव्य डेस्क

Sahitya
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                            बदनाम रहे बटमार मगर, घर तो रखवालों ने लूटा
        
                                                    
                            
मेरी दुल्हन-सी रातों को, नौ लाख सितारों ने लूटा

दो दिन के रैन बसेरे की,
हर चीज चुराई जाती है
दीपक तो अपना जलता है,
पर रात पराई होती है
गलियों से नैन चुरा लाए
तस्वीर किसी के मुखड़े की
रह गए खुले भर रात नयन, दिल तो दिलदारों ने लूटा
मेरी दुल्हन-सी रातों को, नौ लाख सितारों ने लूटा

शबनम-सा बचपन उतरा था,
तारों की गुमसुम गलियों में
थी प्रीति-रीति की समझ नहीं,
तो प्यार मिला था छलियों से
बचपन का सँग जब छूटा तो
नयनों से मिले सजल नयना
नादान नये दो नयनों को, नित नये बजारों ने लूटा
मेरी दुल्हन-सी रातों को, नौ लाख सितारों ने लूटा

कलम की स्वाधीनता के लिए आजीवन संघर्षरत रहे, गीतों के राजकुमार गोपाल सिंह नेपाली। धारा के विपरीत चलकर हिन्दी साहित्य, पत्रकारिता और सिनेमा में ऊंचा दर्जा हासिल करने वाले विशिष्ट कवि और गीतकार थे। बिहार के पश्चिमी चम्पारण जिले के बेतिया में 11 अगस्त 1911 को जन्मे गोपाल सिंह नेपाली की काव्य प्रतिभा बचपन में ही दिखाई देने लगी थी। काफी पहले उन्होंने लिखना शुरू कर दिया था। उनका मूल नाम गोपाल बहादुर सिंह था। उनकी कविताओं में राष्ट्रप्रेम, प्रकृति प्रेम, रोमांस सबकुछ दिखाई देता है। राष्ट्रवादी चेतना भी उनकी कविता में कूट-कूटकर भरी थी। चीनी आक्रमण के समय नेपाली  ने कई ओजपूर्ण और देशभक्ति गीत लिखे- 

घोर अंधकार हो,
चल रही बयार हो,
आज द्वार-द्वार पर यह दिया बुझे नहीं
यह निशीथ का दिया ला रहा विहान है। 
शक्ति का दिया हुआ,
शक्ति को दिया हुआ,
भक्ति से दिया हुआ,
यह स्वतंत्रता-दिया,
रुक रही न नाव हो
ज़ोर का बहाव हो,
आज गंग-धार पर यह दिया बुझे नहीं,
यह स्वदेश का दिया प्राण के समान है।

गोपाल सिंह हिंदी और नेपाली भाषा के प्रसिद्ध कवि हैं। उनका लंबा पत्रकारीय भी जीवन रहा है। 4 हिन्दी पत्रिकाओं- 'रतलाम टाइम्स', 'चित्रपट', 'सुधा और योगी' का संपादन किया। उत्तर छायावाद के जिन कवियों ने अपनी कविता और गीतों की ओर सबका ध्यान आकर्षित किया उनमें गोपाल सिंह नेपाली का नाम अगली पंक्ति में शामिल है। नेपाली की पहली कविता 'भारत गगन के जगमग सितारे' 1930 में रामवृक्ष बेनीपुरी द्वारा संपादित बाल पत्रिका में प्रकाशित हुई थी। कहा जाता है कि किसी कवि सम्मलेन में गोपालजी ने जब मंच से अपनी रचना- 

सुनहरी सुबह नेपाल की, ढलती शाम बंगाल की
कर दे फीका रंग चुनरी का, दोपहरी नैनीताल की

क्या दरस-परस की बात यहां, जहां पत्थर में भगवान है
यह मेरा हिन्दुस्तान है, यह मेरा हिन्दुस्तान है..

प्रस्तुत किया तो रामधारी सिंह दिनकर भी वहां मौजूद थे और नेपाली यह गीत सुनकर गदगद हो गए थे। इतने लोकप्रिय गीत लिखने के बाद भी वे लम्बे समय तक आर्थिक तंगी से घिरे रहे। आखिर में उनकी मुलाक़ात फिल्मिस्तान के तुलाराम जालान से हुई और उन्होंने गोपाल सिंह नेपाली से अनुबंध कर लिया। उसके बाद नेपाली ने सर्वप्रथम फिल्म  'मजदूर' के लिए गीत लिखा। उन्होंने करीब 60 फिल्मों के लिए 400 गीत लिखे। 

दिल दिए चले, दिए चले, हम जिए चले ऐसे, 
इन आँखों में इक आग लिए दो दिए जले ऐसे-  

मोहम्मद रफ़ी और मोहनतारा की आवाज में यह गीत फिल्म 'बेगम' का है।  1948 में  फिल्म 'गजरे' के लिए भी नेपाली ने गीत लिखा।    

1955 में फिल्म 'चित्रगुप्त' के लिए ये गीत लिखा- 

कहाँ जाके ये नैना लड़े 
कि हम तो रह गए खड़े के खड़े
मुख से तो बोली ना अँखियों से बात की 
पलकों से बुला-बुला चितवन से डाँट दी
 
1933  में पहली कविता संग्रह 'उमंग' प्रकाशित हुई। पंछी’ ‘रागिनी’ ‘पंचमी’ ‘नवीन’ और ‘हिमालय ने पुकारा’ इनके काव्य और गीत संग्रह हैं। नेपाली ने सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ के साथ ‘सुध’ मासिक पत्र और कालांतर में ‘रतलाम टाइम्स’, ‘पुण्य भूमि’ और ‘योगी’ के संपादकीय विभाग में काम किया था। साहित्य और सिनेमा में इस योगदान के बावजूद उनकी जीते जी उन्हें वह सम्मान नहीं मिल सका जिसके वे हकदार थे, उन्होंने लिखा भी- 

अफसोस नहीं हमको जीवन में कुछ कर न सके
झोलियां किसी की भर न सके, संताप किसी का हर न सके

अपने प्रति सच्चा रहने का जीवनभर हमने यत्न किया
देखा-देखी हम जी न सके, देखा-देखी हम मर न सके।

17 अप्रैल 1963 गीतों के इस राजकुमार ने अंतिम सांस ली।  उनका लिखा एक गीत-  

अपनेपन का मतवाला था भीड़ों में भी मैं
खो न सका
चाहे जिस दल में मिल जाऊँ इतना सस्ता
मैं हो न सका

देखा जग ने टोपी बदली
तो मन बदला, महिमा बदली
पर ध्वजा बदलने से न यहाँ
मन-मंदिर की प्रतिमा बदली

मेरे नयनों का श्याम रंग जीवन भर कोई
धो न सका
चाहे जिस दल में मिल जाऊँ इतना सस्ता
मैं हो न सका

हड़ताल, जुलूस, सभा, भाषण
चल दिए तमाशे बन-बनके
पलकों की शीतल छाया में
मैं पुनः चला मन का बन के

जो चाहा करता चला सदा प्रस्तावों को मैं
ढो न सका
चाहे जिस दल में मैं जाऊँ इतना सस्ता
मैं हो न सका।
4 वर्ष पहले
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