पंकज राग की कविता 'दिल्ली: शहर दर शहर' बहुत लंबी कविता है। कविता वर्तमान और अतीत का ऐसा महाआख्यान बुनती है, जिसमें कवि एक शहर की नियति के बहाने मनुष्य की ही नियति से दो-चार होती है। कविता बहुत लंबी है इसलिए पाठकों की सुविधा को ध्यान में रखते हुए इसे 2 भागों प्रस्तुत किया जाएगा। आज पेश है भाग-1....
खुश हो लें कि आप दिल्ली में हैं
खुश हो लें कि आप मर्कज में हैं
बिना खतों के लिफाफों में
आपके पते बहुत साफ नहीं
फिर भी आप मजमून बना लेंगे
क्योंकि आप दिल्ली में हैं।
आँखों की पुतलियों पर ठहरती नहीं है दिल्ली
हाथ के आईने में रुकते नहीं हैं लोग
फिर भी, दिल्ली जब जब बुलाती है लोग दौड़े चले आते हैं।
सवाल कई उठते हैं
क्या दिल्ली एक आवाज है
क्या दिल्ली की गलियाँ पुकारती हैं ?
क्या दिल्ली की रातों में आत्माएँ भटकती हैं ?
दिल्ली, जो हमेशा से शहर कहलाती रही
वह कहीं टिकती क्यों नहीं ?
यह हमेशा की बेचैनी कैसी ?
बार बार इलाके बदलने की यह कैसी उत्कंठा ?
बदलते मौसमों का यह शहर
क्या पिघलते मौसमों का भी शहर रहा है ?
जवाब सीधे नहीं हैं,
सीधे जवाब गलत हो जाएँगे
वैसे ही जैसे दिल्ली भी कई बार गलत हो चुकी है
उसका इतिहास गलत हो चुका है
उसके ख्वाब फिर गलतियाँ कर रहे हैं
यह भूल कर कि
फतह और शिकस्त के जाहिराना सिरों के बीच भी
कितनी ही बूँदों ने लगातार टपक कर जगह तलाशी है
इन जगहों का कोई तूर्यनाद नहीं हुआ
पर वे स्वप्नचित्र भी नहीं
सैकड़ों वर्षों से उन जगहों पर वक्त चला है,
दिन ढले हैं,
तकलीफ में भी नींद मौजूँ रही है
और सुबहें कभी कभी सादिक की तरह धुली धुली भी लगी हैं।
उन्हीं जगहों पर इबादत हुई है, खुदा को कोसा भी गया है
होड़ में लोग दौड़े हैं, हताशा में मन बैठा भी है
फख्र भी रहा है, कोफ्त भी हुई है
शगल भी रहे हैं, बीमारी भी
फरामोशी भी हुई है, वफादारी भी।
बदलते इलाकों में भी यह सब बदस्तूर जारी रहा है
जैसे जन्म और मृत्यु
और उनके बीच कायदों से बँधती, उसे तोड़ती
कभी झूलती, कभी झुलाती
पूरी की पूरी जिंदगी।
दिल्ली को खोजना है तो ऐसी जगहों पर भी जाना होगा
शहर सिर्फ महामहिम नहीं, बहुत से मामूली लोग भी बसाते हैं
दिल्ली, शहर दर शहर, सिर्फ निगहबानों की नहीं
इंसानों की भी कहानी है।
सूरजकुंड को बने हजार बरस बीत गए
सूरजकुंड को बने हजार बरस बीत गए
जब वह बना उस वक्त भी बीत चुका था बहुत कुछ
और दूर हो गए थे मौर्य काल के पहले से चली आ रही बसाहटों के अवशेष।
यह अरावली के उत्तर की हवा थी
जिसे तोमर वंश ने अपने गुणगान के लिए रोक रखा था
यह पगडंडियों का जमाना था
जिनके पास पगड़ियाँ थीं
उनके पास रास्ते थे
रास्तों पर तिलक, चंदन, पूजा और मंदिर की शोभा थी
लगान और लगाम से कसी हुई भीड़ थी
जो सूरजकुंड के पास बने सूर्य मंदिर में बहुत कुछ माँगा करती थी
वही सूर्य मंदिर जो अब नहीं है
धूल और मिट्टी, पत्थर और द्रव्य
कुछ बहे, कुछ रहे
जो उड़े उनके पास टोलियाँ थीं
जो पिसे उनके पास घोंसले थे
लाल कोट का पत्थर लाल था
पर चौहानों के आगे पीला पड़ गया
लड़ना व्यावहारिक था, इसलिए धर्म भी था
लाल और पीले टीके चलते रहे
पृथ्वीराज के किला राय पिथौरा में भी जीतना शुभ था
और शुभ ईश्वर था।
समुद्र नहीं था, जानने की ख्वाहिश भी नहीं थी
ख्वाहिशें पगड़ियों के रंगों में सिमटी थीं
और उनसे बाहर जो कुछ भी था
वह तुच्छ था, वह कर्मों का फल था।
वैसे बच्चे उस वक्त भी कहानियाँ सुन कर सोते होंगे
कुछ बेचारे यूँ भी सो जाया करते थे
उनका बचपन सच था कहानी नहीं
सुनने का शौक बड़ों को अधिक था
खास तौर पर अपनी कहानियाँ
जिनका झूठ भी सत्य था
और सत्य हमेशा वीर था।
ऐसी कहानियाँ सुनानेवाले हर सदी में रहते और पनपते हैं
अरावली की हवावाली उस दिल्ली में भी फूले फले चारण और भाट
- पृथ्वीराज की तलवार और ढाल
संयोगिता का रूप बेमिसाल
मुहम्मद गोरी का आतंक
या चंदबरदाई की प्रशस्ति
- इन सब का आप जो चाहें मतलब निकाल सकते हैं
लेकिन आपके सभी मतलब अधूरे ही रहेंगे
क्योंकि गोरी के गुलाम सुल्तान बने पर उनके भी गुलाम थे
कवातुल इस्लाम मस्जिद बनी पर उसके खंभे मंदिरों के थे
कुतुब मीनार ने सर उठाया पर चंद्रगुप्त का लौह स्तम्भ भी खड़ा रहा।
वे तुर्की के मुसलमान ही थे
चाहे कुतबुद्दीन ऐबक हो, या अल्तमश
या फिर गैर-तुर्की गुलाम से प्यार करनेवाली
और तुर्की चहलगानी से लड़नेवाली रजिया हो
पर दिल्ली न हिंदू थी न मुसलमान
वह उसी राजसी खेल के नए पैंतरे देखनेवाली दिल्ली थी
जो इजलास में हँसी मजाक की पाबंदगी पर हैरान भी होती थी और फिर
खुदा की परछाईं बने बल्बन पर
पीछे पीछे हँस भी लेती थी
जो नस्ली अभिजात्य के बड़बोलेपन से खौफजदा भी थी
और तुर्की अमीरजादों को सजदा और पैबोस में झुका देख
अपना डर थोड़ा कम भी कर लेती थी
जो मेवाती लुटेरों के डर से मुक्ति पा कर राहत की साँस भी भरती थी
और हलाकू के पोते के साथ आए हजारों मंगोलों के
शहर में बसने से आक्रांत भी हो जाती थी।
पगड़ियाँ बदलने लगी थीं
बाँधने के तरीके भी
आदमी किसी और आदमी को देख रहा था
आदमी किसी और आदमी से लड़ रहा था
और आदमी किसी और आदमी से मिल भी रहा था
आदमी और कुछ और आदमी मिल कर बना रहे थे
मिले जुले आदमी
यह भी एक जिंदगी थी
जो तमाम राजसी खेलों के समानांतर बड़ी तेजी से चल रही थी
और दिल्ली जी रही थी।
भीड़ अंदर थी, बाहर सन्नाटा था
सीरी फोर्ट ऑडिटोरियम में अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह चल रहा था
और वहीं बाहर की कार पार्किंग में एक स्विस महिला के साथ बलात्कार
भीड़ अंदर थी, बाहर सन्नाटा था
और वैसे भी दिल्ली की भीड़ ऐसे मौकों पर अलग ही पाई जाती है
वह जल्दी टोकती नहीं
वह चलती है, चलने देती है
उसे अचरज भी नहीं होता
जैसे उस दिन भी नहीं जब अलाउद्दीन खिलजी ने कुतुब छोड़
अपनी राजधानी सीरी को बनाया।
नई जगह थी, नए अमीर थे
तुर्की अमीरजादों की कमर तोड़ कर और बुलंद था शाही फरमान
विरोध मना था, षडयंत्र पर नजर थी
हौजखास से जमातखाना मस्जिद तक फैला था शहर
इमारतों के गुंबद अब और चौड़े थे
अमीर उमरा के नस्ली आधार की तरह
लेकिन सीरी में दरख्तों के बीच जगह कम थी
अमीरी का फैलना शक में डालता था
शायद इसलिए दिल्ली में दावतें खुशनसीब नहीं थीं।
दिल्ली को अभी बहुत कुछ देखना था
अभी तो साम्राज्यवाद का पहला डंका था
जो मलिक कफूर के साथ दक्कन तक बजा
अब कुल का नहीं ताकत और लूट का अभिजात्य था
जिसके आगे जौहर में जल गए कुलीनता के ढोए तकाजे
पता नहीं अलाउद्दीन ने किसी पद्मिनी को देखा भी या नहीं
पर रणथंभोर और चित्तौड़ ने देख लिया इस नए तेवर की दिल्ली को
जिसकी इमारतों में मंगोल कारीगरों ने पहली बार
पद्म की कलियाँ बनायी थीं
और बनाए थे सच्चे मेहराब
बिना यह समझे कि उसके ऊपर बैठा था हुकूमत का एक ऐसा सच
जो लूटता था पर बाँटता नहीं
जो हिस्सा माँगने पर मंगोलों का खून पानी की तरह बहा सकता था
और उस पानी को अपने हौज-ए-खास में इकट्ठा कर
दिल्लीवालों को पिला सकता था।
साम्राज्यवाद चाहे छुपा हो या बेबाक
मध्यकालीन हो या नवीन
उसकी जड़ों में कहीं न कहीं पोशीदा रहता है बाजार।
मानो दिल्ली से निकली सेनाओं के हुजूम में बैठे थे तीन जादूगर
- अलाउद्दीन के बनाए तीन बाजार
लगान को बढ़ा कर गल्ले की शक्ल दी गई
इस शक्ल को मुकद्दमों से बदल कर
दोआब के नए आमिलों की कठोर भंगिमा दी गई
और इस शक्ल को सीधी वसूली से पाला पोसा
एक ऐसा वयस्क शरीर दिया गया
जिसके आगे बच्चों की तरह मचलती कीमतों ने दम तोड़ दिया।
यह सामंतवादी साम्राज्यवाद की हुंकार थी
जहाँ घोड़े और गुलामों के दाम भी बँधे थे
और विदेशी कपड़ों का सलीका भी नियंत्रित था
जहाँ सैनिक और अमीर अभी वैसी पहाड़ी नदियाँ थे
जो घाट तोड़ नहीं पातीं
और जहाँ बरनी अमलदारी के अहाते में वजू के लिए हौज की तलाश में
गंगा जमुना को देख नहीं पाता था
लेकिन गंगा भी बह रही थी और जमुना भी
दोनों के पानी से अलग अलग भी स्वर निकलते थे
और साथ साथ भी
अमीर खुसरो की हिंदवी की तरह
जो कभी रबाब के हल्के तरंगों पर
ऐमन और सनम जैसी फारसी रागदारियों के साथ
महफिलों की शमादानों को जलाती थी
तो कभी बिल्कुल अपनी सी बन कर
निजामुद्दीन औलिया और बख्तियार काकी के इर्द गिर्द फैले
तमाम जातियों और मजहबों के हुजूम को
प्रेम का मधवा पिलाती थी।
पनघट की डगर अभी भी कठिन थी
और कई पहेलियाँ समझ में भी नहीं आती थीं
फिर भी मटकियाँ जमुना से भरी जा सकती थीं
रात में थक कर लौटने के लिए घर सलामत थे
जिनके अंदर जिहाले मिस्कीं मकुन तगाफुल की दिल्ली
नैना जुड़ाती थी और बतियाँ बनाती थी।
दिल्ली की धूप
हमेशा से तीखी
जैसे हर इच्छा, आकांक्षा, विश्वास या सनक के पीछे एक जीवंतता हो।
पहले दिल्ली की गर्मी में चिपचिपाहट नहीं थी
जो भी था वह ठोस ठोस था
जैसे तुगलकाबाद को छोड़ बनाया गया मुहम्मद बिन तुगलक का जहाँपनाह
धूसर पत्थरों की किलानुमा इमारतों का सिलसिला
वही खुरदुरापन इतना ज्यादा
कि ढलानवाली दीवारों के बावजूद सुल्तानी दंभ फिसले नहीं।
इसका कोई तुक नहीं कि मुहम्मद तुगलक के जहाँपनाह
की दीवारों के दक्षिण में आज आई.आई.टी. की इमारत है
अतीत की नीरसता और भविष्य की यांत्रिकी के बीच
एक सीधी रेखा खींचने पर लोग एतराज करेंगे
यंत्रचलित विश्व आगे भागता है पीछे नहीं
और गियासुद्दीन तुगलक के मकबरे को भले ही
दारुल अमन का नाम दे दिया गया हो
पर उससे उसके मौत की दुर्घटना शांत नहीं हो पाई।
मध्यकालीन दिल्ली थी
अफवाहों की गलियाँ थीं
आज की तरह ही बढ़ा चढ़ा कर सच बताने की दलीलें
होड़ कम पर विश्वास अधिक
तब सतपुल के नीचे पानी ठहरा नहीं था
और निजामुद्दीन औलिया के 'अभी दिल्ली दूर है' के कथन की चर्चा
आक्रांत भी करती थी और रोमांचित भी
सूफियाना कव्वालियों की मदमस्ती की तरह
वह एक अलग दुनिया थी
वह भी दिल्ली थी
वहाँ एक दूसरा जहाँपनाह था
उसके मुरीद थे, उसके गरीब थे
जो खुदा को रोज छूते थे, उसमें मिल जाते थे
मिलने की खुशी में अमीर हो लेते थे
पर उसके बाद फिर से गरीब थे
अँधेरा था, फिर भी रोशन थी चिराग दिल्ली।
मालवीय नगर से कालकाजी जानेवाली सड़क पर
शाम के धुँधलके में चलने भर से
उस जमाने की दिल्ली की पर्तें खुलती जाएँगी, ऐसा भी नहीं है।
पर्तें ही सीधी कहाँ होती हैं
और धूसर इमारतों का धुँधलके में मिल जाने का खतरा
तो हमेशा से ही रहा है।
मुहम्मद तुगलक सूफी नहीं था
पर उसके योगियों और जैनियों से मिलने पर
उसे यौक्तिक और तार्किक कह कर गालियाँ कइयों ने दीं
दिल्ली से हटा कर देवगिरि को अपनी राजधानी बना कर
दौलताबाद नाम देना यदि राजनीति थी
तो दिल्ली के अफसरान, बड़े लोगों और खुदा से मिलनेवाले सूफियों को
दिल्ली छोड़ उस अनदेखे दौलत की ओर
जबरन ले चलने पर मजबूर करने को
जुल्म की शक्ल दी गई।
बड़े लोग तब भी दिल्ली नहीं छोड़ना चाहते थे
पर विचारों का तिलिस्म बनानेवाले वे ही तब भी थे
शायद इसीलिए इतिहास में कैद नहीं है
दिल्लीवालों के लिए इतने सारे सूफियों के जाने का अफसोस या
बड़े बड़े लोगों से विमुक्त उनकी राहत भरी साँस।
सूफियाना हवाएँ दक्कन पहुँचीं या मुहम्मदी फतह कांगड़ा पहुँची
इससे उन्हें क्या
उनकी अनुभूतियों की चादर अभी भी उनकी अपनी थी
और वैसे भी दिल्लीवालों को दिल्ली से बाहर कुछ दिखा ही कब है!
होती रहे चाँदी की कमी दुनिया में,
उनकी कल्पना की दिल्ली तो खुद चाँदी थी
यह चाँदी थोड़ी धूमिल हो सकती थी
बहुतेरे सूफियों के जाने के मलाल से
या दौलताबाद से पानी की कमी के कारण लौटे अमीर उमरा को ले कर
पर इसका रसूख मस्तिष्क की कई तहों तक फैला था
इसीलिए जहाँपनाह के काँसे के सिक्के चल नहीं पाए।
कुछ बरस बाद भी जब मौत की प्लेग चल निकली
और तुगलक बादशाह भी दिल्ली छोड़ स्वर्गद्वारी चल पड़े
तो भी दिल्ली बैठी नहीं,
मर कर जिंदा हुई उसी जहाँपनाह में
और उसी वक्त जब दोआब में फसल सुधार का सुल्तानी प्रयोग
करों की क्रूर संरचना के कारण दम तोड़ रहा था।
ढाँचा तो नहीं बदला
पर कभी कभी शाम के उसी ढलान पर
बिना बामुलाहिजा होशियार
दिल्ली जीतती रही।
तुम मुझे फीरोजी बना दो
दिल्ली की उस मध्यमवर्गीय लड़की ने अपने पास बैठे लड़के से कहा
कोटला फीरोजशाह के स्लेटी खंडहरों के बीच
उस लड़के का उत्तर फँस सा गया
फिर इन दोनों की कहानी का कुछ नहीं हुआ
वैसे ही जैसे फीरोजाबाद का भी कुछ न हो सका
मानो कुलीनों और उलेमा को मनाते मनाते थक कर
फीरोजशाह शिकार पर निकल गया हो
शहर से दूर - जोर बाग और करोलबाग में
वहीं जहाँ कुलीन बसते हैं और जहाँ कुलीन नहीं बसते हैं।
फीरोजाबाद में ही कुलीनता वंशानुगत हुई
फीरोजाबाद की औरतों को फकीरों की मजारों पर जाने की मनाही हुई
फीरोजाबाद के सिपाहियों को तनख्वाह नहीं, गांवों की लगान का हक मिला
और फीरोजाबाद के घोड़ों को ताकत से नहीं रिश्वत से तौला गया
पर हौजखास से पीर गैब तक फैले इस शहर में हवा फिर भी बहती रही
सिर्फ जमुना के किनारे से निकाली नहरों के पास ही नहीं
बल्कि खैराती अस्पतालों, मदरसों
और सरकारी दहेज से ब्याही विपन्न बेटियों के पास भी।
फिर चीजों के दाम कम थे,
इसलिए मुफलिसी भी पल ही गई
वैसे देखा जाए तो इससे हवा को क्या फर्क पड़ता
कि फीरोजशाह ने उलेमा से डर कर
अपने महल की चित्राकरी खुद खुरचवा दी
या कि फीरोजशाह की बनवाई इमारतों से
अधिक सराही गईं बेगमपुरी और खिड़की मस्जिद जैसी
उसके वजीर खान-ए-जहान जूनां शाह की सात मस्जिदें
पर दिल्ली को हमेशा फर्क लगा है
खुशामदगी के उलझते धागों को दिल्ली
न कभी सुलझा पाई और न बाँध ही पाई
वह बस फीरोज की तरह कुतुब मीनार की मंजिलें बढ़वाती रह गई।
जिस अशोक स्तंभ को फीरोज शाह ने
अंबाले से ला कर कुश्क-ए-फीरोज में लगाया
उसका रंग तो और भी स्याह था
एक लाख अस्सी हजार गुलामों को छू कर बहते बहते
हवा भी फीरोजी न रही
और अंदर ही अंदर सीझते शहर की मौत तक शिकारगाहें भी पस्त हो चली थीं।
फीरोज अपनी मुश्किलों के साथ हौजखास में दफ्न हुआ
कोटला फीरोज शाह की आलीशान जामी मस्जिद में नमाज सशंकित सी रही
वही मस्जिद जिसके खंडहरों में बैठे जोड़ों की कहानी आज भी आगे नहीं बढ़ पाती
दिल्ली उन्हें ठुकराती नहीं
पर बेसलीके ही सही उनकी उलझनों को किनारे कर
समय आते ही आगे निकल जाती है।
साभार: यह भूमंडल की रात है, पंकज राग (राजकमल प्रकाशन)
8 वर्ष पहले