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आज का शब्द-ओट और अज्ञेय की कविता: मैंने आहुति बन कर देखा

रत्नेश मिश्र

Aaj Ka Shabd
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                                                  अपने विचारों, भावनाओं और संवेदनाओं को व्यक्त करने का सबसे सशक्त माध्यम मातृभाषा है। इसी के जरिये हम अपनी बात को सहजता और सुगमता से दूसरों तक पहुंचा पाते हैं। हिंदी की लोकप्रियता और पाठकों से उसके दिली रिश्तों को देखते हुए उसके प्रचार-प्रसार के लिए अमर उजाला ने ‘हिंदी हैं हम’ अभियान की शुरुआत की है। इस कड़ी में साहित्यकारों के लेखकीय अवदानों को अमर उजाला और अमर उजाला काव्य हिंदी हैं हम श्रृंखला के तहत पाठकों तक पहुंचाने का प्रयास कर रहा है। हिंदी हैं हम शब्द श्रृंखला में आज का शब्द है-ओट जिसका अर्थ है-  1. छिपने की आड़; परदा 2. शरणस्थल; पनाहगाह। प्रस्तुत है अज्ञेय की कविता- मैंने आहुति बन कर देख...

मैं कब कहता हूं जग मेरी दुर्धर गति के अनुकूल बने, 
मैं कब कहता हूं जीवन-मरू नंदन-कानन का फूल बने ? 
काँटा कठोर है, तीखा है, उसमें उसकी मर्यादा है, 
मैं कब कहता हूं वह घटकर प्रांतर का ओछा फूल बने ? 
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मैं कब कहता हूं मुझे युद्ध में कहीं न तीखी चोट मिले ? 
मैं कब कहता हूं प्यार करूं तो मुझे प्राप्ति की #ओट मिले ? 
मैं कब कहता हूं विजय करूं मेरा ऊंचा प्रासाद बने ? 
या पात्र जगत की श्रद्धा की मेरी धुंधली-सी याद बने ? 

पथ मेरा रहे प्रशस्त सदा क्यों विकल करे यह चाह मुझे ? 
नेतृत्व न मेरा छिन जावे क्यों इसकी हो परवाह मुझे ? 
मैं प्रस्तुत हूं चाहे मेरी मिट्टी जनपद की धूल बने- 
फिर उस धूली का कण-कण भी मेरा गति-रोधक शूल बने ! 

अपने जीवन का रस देकर जिसको यत्नों से पाला है- 
क्या वह केवल अवसाद-मलिन झरते आंसू की माला है ? 
वे रोगी होंगे प्रेम जिन्हें अनुभव-रस का कटु प्याला है- 
वे मुर्दे होंगे प्रेम जिन्हें सम्मोहन कारी हाला है 

मैंने विदग्ध हो जान लिया, अन्तिम रहस्य पहचान लिया- 
मैंने आहुति बन कर देखा यह प्रेम यज्ञ की ज्वाला है ! 
मैं कहता हूं, मैं बढ़ता हूं, मैं नभ की चोटी चढ़ता हूं 
कुचला जाकर भी धूली-सा आंधी सा और उमड़ता हूं 

मेरा जीवन ललकार बने, असफलता ही असि-धार बने 
इस निर्मम रण में पग-पग का रुकना ही मेरा वार बने ! 
भव सारा तुझ पर है स्वाहा सब कुछ तप कर अंगार बने- 
तेरी पुकार सा दुर्निवार मेरा यह नीरव प्यार बने 
5 वर्ष पहले
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Deepak Sharma

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