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आज का शब्द- अकिंचन और रामावतार त्यागी की कविता: मन समर्पित, तन समर्पित...

रत्नेश मिश्र

Aaj Ka Shabd
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                                                  अपने विचारों, भावनाओं और संवेदनाओं को व्यक्त करने का सबसे सशक्त माध्यम मातृभाषा है। इसी के जरिये हम अपनी बात को सहजता और सुगमता से दूसरों तक पहुंचा पाते हैं। हिंदी की लोकप्रियता और पाठकों से उसके दिली रिश्तों को देखते हुए उसके प्रचार-प्रसार के लिए अमर उजाला ने ‘हिंदी हैं हम’अभियान की शुरुआत की है। इस कड़ी में साहित्यकारों के लेखकीय अवदानों को अमर उजाला और अमर उजाला काव्य हिंदी हैं हम श्रृंखला के तहत पाठकों तक पहुंचाने का प्रयास कर रहा है। हिंदी हैं हम शब्द श्रृंखला में आज का शब्द है- अकिंचन, जिसका अर्थ है- 1. अतिनिर्धन; दरिद्र; कंगाल; दिवालिया 2. अपरिग्रही 3. नगण्य; मामूली; महत्वहीन 4. परावलंबी 5. गुमनाम। प्रस्तुत है रामावतार त्यागी की कविता: मन समर्पित, तन समर्पित...

मन समर्पित, तन समर्पित,
और यह जीवन समर्पित।
चाहता हूं देश की धरती, तुझे कुछ और भी दूं।
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माँ तुम्हारा ऋण बहुत है, मैं #अकिंचन,
किंतु इतना कर रहा, फिर भी निवेदन-
थाल में लाऊं सजाकर भाल मैं जब भी,
कर दया स्वीकार लेना यह समर्पण।

गान अर्पित, प्राण अर्पित,
रक्त का कण-कण समर्पित।
चाहता हूं देश की धरती, तुझे कुछ और भी दूं।

मांज दो तलवार को, लाओ न देरी,
बांध दो कसकर, कमर पर ढाल मेरी,
भाल पर मल दो, चरण की धूल थोड़ी,
शीश पर आशीष की छाया धनेरी।

स्वप्न अर्पित, प्रश्न अर्पित,
आयु का क्षण-क्षण समर्पित।
चाहता हूं देश की धरती, तुझे कुछ और भी दूं।

तोड़ता हूं मोह का बंधन, क्षमा दो,
गांव मेरी, द्वार-घर मेरी, आंगन, क्षमा दो,
आज सीधे हाथ में तलवार दे-दो,
और बाएं हाथ में ध्वज को थमा दो।

सुमन अर्पित, चमन अर्पित,
नीड़ का तृण-तृण समर्पित।
चाहता हूं देश की धरती, तुझे कुछ और भी दूं।
6 वर्ष पहले
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