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नागार्जुन की कविता- बाघ का खानदान विस्थापित हो गया

काव्य डेस्क

Kavita
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                            जंगल में
        
                                                    
                            
लगी रही आग
लगातार तीन दिन, दो रात
निकटवर्ती गुफ़ावाला
बाघ का खानदान
विस्थापित हो गया

उस झरने के निकट
उसकी गुफ़ा भी
दावानल के चपेट में
आ गई थी...
वो अब किधर
भटक रहा होगा ?
रात को निकलता होगा
पूर्ववत्...

बाघिन बेचारी
अपने दोनों बच्चों पर
रात-दिन पहरा देती होगी
मध्यरात्रि में
आसपास की झाड़ियों के
चक्कर लगा आती होगी
ज़रूर ही जल्द वापस होती होगी
वात्सल्य क्या
उस ग़रीब का
स्थाई भाव न होगा
बाघ लेकिन
सारा-सारा दिन
वापस न आता होगा
हाँ, शिकार पा जाने पर
फौरन लौटता होगा बाघ !

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