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Hindi Poetry: बिमल सहगल की कविता- जब आसमान बरसता है

काव्य डेस्क

Kavita
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                            पेट में रोटी, तन पे कपड़ा और सिर पे छत 
        
                                                    
                            
सभी तो जरूरी हैं जीने के लिए
जैसे-तैसे, थोड़ा-बहुत रोटी-कपड़ा तो 
पा लेता है इंसान भीख में भी 
मगर हर किसी के सिर पर छत नहीं होती
यह सब साफ दिखता है जब भी आसमान बरसता है -
पक्की छतों वाले चढ़ जाते हैं उनपे खुशी से नाचने      
कच्ची छतों वाले भी दौड़ते तो हैं 
मगर ऊपर जा पानी का रास्ता बनाने-
अपना सर्वस्व बचाने; 
छप्पर वाले भी घबरा कर
सिर के ऊपर टीन-टप्पर की करते हैं 
आपातकालीन भरपाई
और साथ में नीचे से भी उसकी जरूरी तुरपाई।  
आसमान के छतों पर अभेद टपकने पे 
कहीं खुशी का माहौल होता है 
तो कहीं छा जाता है आफत का मातम;  
और जो जीते हैं बेघर खुले आसमान के नीचे 
वो भी जरूर उलझन में पड़ जाते हैं ऐसे में 
कि तटस्थ रह इसमें तन-मन को भिगो लें 
या फिर मोह-माया के अपने टीन-टप्पर को समेट 
किसी लावारिस छत को जा 
पनाह देने के लिए गुहार लगाएँ।  
2 वर्ष पहले
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