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शम्पा अंदलीब की ग़ज़ल: बीज वफ़ा के बोते हैं

काव्य डेस्क

Kavita
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                            बीज वफ़ा के बोते हैं
        
                                                    
                            
फिर भी तन्हा रोते हैं

दिल में रहने वाले लोग
दीमक जैसे होते हैं

कुछ पाने की हसरत में
क्या कुछ हम सब खोते हैं

फ़स्ल-ए-गुल की ख़्वाहिश में
बंजर खेत भी जोते हैं

चोर न घर में आ जाए
जगते जगते सोते हैं

हम मुश्किल से लड़ते हैं
रोने वाले रोते हैं

ख़्वाब के मारे बेचारे
मेरे जैसे होते हैं

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2 महीने पहले
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