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शैलजा पाठक: अम्मा डिप्रेशन नहीं जानती

काव्य डेस्क

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                            अम्मा डिप्रेशन नहीं जानती 
        
                                                    
                            

रात में हिचकियों से भरी मेरी देह से बेचैन हो 
गरम कपड़े से छाती सेंकती थी
एकदम से हड़बड़ाकर ढेर-सा तेल सर पर मल देती थी
सरसों के गरम तेल से तलुओं की मालिश करती 
अम्मा डिप्रेशन नहीं जानती थी

पंडित से कुंडली की किसी ग्रह दशा पर बात करती 
किसी अचानक से रखी पूजा में मेरे नाम का संकल्प लेती 
किी मंत्र को ज़ुबान पर बांधने को मानती 
न जाने किस किस को बुला कर नज़र उतरवाती 
आधी-आधी रात भरी बाल्टी का पानी मुझे सर पर डालते देख 
मंदिर में कोई जाप करने लगती 
अम्मा डिप्रेशन नहीं जानती थी 

महीना चढ़ गया क्या 
उधर घर वाले ठीक हैं न 
कोई कुछ बोला क्या 
उदर मन नहीं लगता?
कुछ नहीं बोलोगी तो पता कैसे चलेगा 
पैर टटा रहा?
छाती में दर्द?
कंधा या कमर?
ज़्यादा काम तो नहीं पड़ा गया!

मन की बीमारी से नावाकिफ़ अम्मा तो कभी न जान पाई
कि मन की भी महीन बीमारियां होती हैं
पर्स में दस हज़ार रखने 
हवाई जहाज़ से आने जाने वाली बेटियों को चेक इन चेक आउट करना 
बस चमक भर है 
इनके मन की तमाम गांठें हैं
इन्हें सही जगह चेक इन करवाने की ज़रूरत थी 

हमको कुछ समझ में नहीं आ रहा अम्मा हमको हुआ क्या है

ठीक ऐसा कहते थाम लेना चाहिए किसी को हाथ 
पीठ को सहलाना चाहिए 
और कहना चाहिए 
होता है ऐसा, कोई बात नहीं 
बुख़ार ठीक करने की तरह 
मन ठीक करने वाले भी हैं 
तुमको ले चलेंगे 
तुम ठीक हो जाओगी...



साभार - राजकमल प्रकाशन 
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