छोटी सी बात को
वह पहाड़ बना देती थी,
उसकी बेरुखी सचमुच
जिंदगी को पहाड़ बना देती थी।
याद आती हैं उसकी मीठी बातें
जब मन की रंगोली से
वह अपने सपनों का
इंद्रधनुष बना देती थी।
जिंदगी को खुशगवार और
मुकम्मल बना देती थी।
अब सिर्फ यादें हैं...
उसकी हसरतें लिए
ताउम्र दौड़ रहा हूं,
इक उम्र के बाद
फीके पड़ने लगे हैं रंग,
तो वह लौट आई हैं
सारी यादें लेकर।
मन के कोने में
वह जलाती है दीप।
अब रोशनी है और
उसका झिलमिलाता चेहरा।
मुकम्मल हो रही है
जिंदगी कुछ इस तरह कि
बेरुखी की दीवार
अब ढहने लगी है।
प्रेम फिर लौट आया है
उड़ने लगा है आसमान में,
सपनों का इंद्रधनुष
फिर दिखने लगा है।
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