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Hindi Poetry: पुष्पिता अवस्थी की कविता- बड़ी कुशलता से हम छीनने में लगे हैं सर्वस्व

काव्य डेस्क

Kavita
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                                                  हमारी भक्ति से अधिक
समर्पण है - भक्ति 
शब्द में।

हमसे कहां छूट पाता है - 
माया का मोह
भक्ति की दुर्लभ
साधना के क्षणों में।

प्रेम शब्द पूर्ण हैं - 
ईश्वरीय दिव्यता से।

हमारे प्रेम में
बनी रहती है 
मनुष्य होने की
सारी दुर्बलताएं ।

प्रकृति शब्द में
समाई है पृथ्वी
और उसका सृजन।

हमारी प्रकृति में
मनुष्य होने पर भी
नहीं बचा है मनुष्यत्व।

स्त्री शब्द में
शेष है विश्व - स्त्री - अस्मिता 
उसका प्रेम, ममत्व और
और त्याग।
 
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हमारे लिए
स्त्री ,आवश्यकता का
पर्याय है।
जिसमें शामिल है 
सभी तरह की भूख
और उसकी जरूरत।

पानी शब्द में
बची है पारदर्शिता
और बुझती है प्यास
आंखों से लेकर ओठों तक की।

हमने पानी
को भी बदल दिया है 
भोग के स्वाद और रंगो में।

संस्कृति से छीन ली है 
हमने संस्कृति।
शिक्षा से  छीन 
लिया है सृजन।
मनुष्य से छीन रहे हैं
मनुष्यता।
स्त्री से उसकी निर्मलता
बच्चों से उनका बचपना।

बड़ी कुशलता से
हम छीनने में लगे हैं 
सर्वस्व 
जो ईश्वर का दिया है 
और मनुष्य का रचा 
बसा है।
सदियों के उद्यम से।

हम से अधिक
समर्थ हैं शब्द
उनमें उनका अर्थ
अभी भी बचा हुआ है 
हमारे द्वारा छीने के बाद भी।
2 वर्ष पहले
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