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नाज़िम हिकमत: कभी न लौटने के लिए जाना

काव्य डेस्क

Kavita
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रात और बर्फ़ खिड़कियों के शीशों पर।
रुपहली रात में पटरियाँ चमकती हैं
याद दिलाती हुई
कभी न लौटने के लिए जाने वाले की।
तीसरे दर्जे के मुसाफ़िरख़ाने में
लेटी है एक औरत
उसके सिर पर काला स्कार्फ़,
उसके पैर नंगे।
मैं चहलक़दमी करता हुआ
आगे जाता हूँ—पीछे लौटता हूँ।
रात और बर्फ़ खिड़की के शीशों पर।
भीतर कुछ लोग गा रहे हैं
एक गीत; मेरे बिछुड़े साथी का
बहुत-बहुत पसंदीदा।
उसका पसंदीदा गीत
उसका पसंदीदा
उसका...
मेरी आँखों में मत झाँकों, बिरादरान,
मेरा दिल रोने-रोने को आ रहा है।
रुपहली रात में पटरियाँ चमकती हैं
याद दिलाती हुई कभी न लौटने के लिए जाने वाले की।
एक औरत काले स्कार्फ़ में
लेटी है
तीसरे दर्जे के मुसाफ़िरख़ाने में
और उसके पैर नंगे हैं।
रात और बर्फ़ खिड़कियों के शीशों पर
वे गा रहे हैं कहीं भीतर। 
 
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