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Hindi Kavita: राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त की कविता 'मृषा मृत्यु का भय है जीवन की ही जय है'

काव्य डेस्क

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मृषा मृत्यु का भय है
जीवन की ही जय है।

जीव की जड़ जमा रहा है
नित नव वैभव कमा रहा है
यह आत्मा अक्षय है
जीवन की ही जय है।

नया जन्म ही जग पाता है
मरण मूढ़-सा रह जाता है
एक बीज सौ उपजाता है
सृष्टा बड़ा सदय है
जीवन की ही जय है।

जीवन पर सौ बार मरूँ मैं
क्या इस धन को गाड़ धरूँ मैं
यदि न उचित उपयोग करूँ मैं
तो फिर महाप्रलय है
जीवन की ही जय है।

2 वर्ष पहले
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