विज्ञापन

कुंवर नारायण: मैं कहीं और भी होता हूँ जब कविता लिखता

काव्य डेस्क

Kavita
विज्ञापन
                                    
                                                                        
                            


मैं कहीं और भी होता हूँ
जब कविता लिखता

कुछ भी करते हुए
कहीं और भी होना 
धीरे-धीरे मेरी आदत-सी बन चुकी है

हर वक़्त बस वहीं होना
जहाँ कुछ कर रहा हूँ
एक तरह की कम-समझी है
जो मुझे सीमित करती है

ज़िन्दगी बेहद जगह मांगती है
फैलने के लिए

इसे फैसले को ज़रूरी समझता हूँ
और अपनी मजबूरी भी
पहुंचना चाहता हूँ अन्तरिक्ष तक
फिर लौटना चाहता हूँ सब तक
जैसे लौटती हैं
किसी उपग्रह को छूकर
जीवन की असंख्य तरंगें... 
 
हमारे यूट्यूब चैनल को Subscribe करें।   
11 महीने पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Nathuram Kaswan

8702 कविताएं

View Profile

Manoj Kumar

428 कविताएं

View Profile