विज्ञापन

केदारनाथ सिंह: सूर्यास्त के बाद एक अंधेरी बस्ती से गुजरते हुए

काव्य डेस्क

Kavita
विज्ञापन
                                    
                                                                        
                            


भर लो
दूध की धार की
धीमी-धीमी चोटें
दिये की लौ की पहली कंपकंपी
आत्मा में भर लो

भर लो
एक झुकी हुई बूढ़ी
निगाह के सामने
मानस की पहली चौपाई का खुलना
और अंतिम दोहे का
सुलगना भर लो

भर लो
ताकती हुई आंखों का
अथाह सन्नाटा
सिवानों पर स्यारों के
फेंकरने की आवाज़ें
बिच्छुओं के
उठे हुए डंकों की
सारी बेचैनी
आत्मा में भर लो

और कवि जी सुनो
इससे पहले कि भूख का हांका पड़े
और अंधेरा तुम्हें चींथ डाले
भर लो
इस पूरे ब्रह्मांड को
एक छोटी-सी साँस की
डिबिया में भर लो 
 
हमारे यूट्यूब चैनल को Subscribe करें।
4 महीने पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all