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केदारनाथ अग्रवाल: सूर्यास्त में समा गयीं, सूर्योदय की सड़कें

काव्य डेस्क

Kavita
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सूर्यास्त में समा गयीं
सूर्योदय की सड़कें,
जिन पर चलें हम
तमाम दिन सिर और सीना ताने,
महाकाश को भी वशवर्ती बनाने,
भूमि का दायित्व
उत्क्रांति से निभाने,
और हम
अब रात में समा गए,
स्वप्न की देख-रेख में
सुबह की खोयी सड़कों का
जी-जान से पता लगाने 
 
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3 महीने पहले
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