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कमलेश राजहंस: भावुक मन का दर्पण फूट गया

काव्य डेस्क

Kavita
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                            भावुक मन का दर्पण फूट गया 
        
                                                    
                            

             अनभावों ने पत्थर मारा 
              खट से टूट गया।

तुलसी की चौरा पर, नागफनी के झाड़ उगे 
अनव्याहे रिश्ते, आंखों को लगने लगे सगे 
                औचक साथ किनारों से 
                     लहरों का छूट गया ।

इर्द गिर्द बगुलों के, फेरा देने लगी मछलियां 
कागज के निर्गन्ध सुमन पर, उड़ने लगी तितलियां 
                   झरनों के अधरों पर ताले 
                     सावन रूठ गया ।

अपना बन कर अपनों ने, अपनों से घात किया 
मुर्छित हुई बहारें, माली ने आघात किया 
                      नयनों में खारे सुमनों की 
                        माला गूंथ गया।

सूरज आंख बंद कर सोया, तम खा गया उजाला 
घोर अमावस हुआ, चांद के यौवन का रखवाला 
                         हाथ पकड़ गीता का 
                           न्यायालय में झूठ गया।

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