विज्ञापन

कमलेश राजहंस: भावुक मन का दर्पण फूट गया

काव्य डेस्क

Kavita
विज्ञापन
                                    
                                                                        
                            भावुक मन का दर्पण फूट गया 
        
                                                    
                            

             अनभावों ने पत्थर मारा 
              खट से टूट गया।

तुलसी की चौरा पर, नागफनी के झाड़ उगे 
अनव्याहे रिश्ते, आंखों को लगने लगे सगे 
                औचक साथ किनारों से 
                     लहरों का छूट गया ।

इर्द गिर्द बगुलों के, फेरा देने लगी मछलियां 
कागज के निर्गन्ध सुमन पर, उड़ने लगी तितलियां 
                   झरनों के अधरों पर ताले 
                     सावन रूठ गया ।

अपना बन कर अपनों ने, अपनों से घात किया 
मुर्छित हुई बहारें, माली ने आघात किया 
                      नयनों में खारे सुमनों की 
                        माला गूंथ गया।

सूरज आंख बंद कर सोया, तम खा गया उजाला 
घोर अमावस हुआ, चांद के यौवन का रखवाला 
                         हाथ पकड़ गीता का 
                           न्यायालय में झूठ गया।

हमारे यूट्यूब चैनल को Subscribe करें।



 
एक महीने पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Bajrang Lal

19 कविताएं

View Profile

Updesh Kumar

12655 कविताएं

View Profile