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कमलेश राजहंस द्वारा रचित खंड काव्य 'कैकयी की वेदना' से कुछ मार्मिक छंद

काव्य डेस्क

Kavita
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                            तपसी उदासी यति चित्रकूट वासी संत 
        
                                                    
                            
    ऋषि मुनि गण को प्रणाम करती हूं मैं 
राम सौमित्र सिय सेवा रत नित्य 
  जन जाति जन गण को प्रणाम करती हूं मैं 
शीत घाम बरसा से तुझको बचाने वाले 
  गिरि गुहा वन को प्रणाम करती हूं मैं 
प्राण पर खेल कर प्रण को निभाने वाले 
  राम तेरे प्रण को प्रणाम करती हूं मैं।।


तेरी माता होने का जो मुझको था अभिमान 
   अभिमान राम तेरे साथ में चला गया 
हो गयी हूं मैं अबोध मुझको न कोई बोध 
  सारा ज्ञान राम तेरे साथ में चला गया 
हर ओर अपमान दीखता न कहीं मान 
  सारा मान राम तेरे साथ में चला गया 
भले मेरा तन तेरे साथ में न गया किन्तु 
  कैकयी का प्राण तेरे साथ में चला गया।।


भद्दी भद्दी गालियों से जग ने नवाजा मुझे 
  सुनी शिर धुनी किन्तु अधरों को सी गयी 
वेटा वन वासी औ सोहाग स्वर्ग वासी हुआ 
  दुखों का पहाड़ गिरा फिर भी मैं जी गयी 
पापिनी बना के मेरा कोख मुझे छोड़ दिया 
  कुलटा कसाई की उपाधि मुझे दी गयी 
राम तुझे राजा तीनों लोकों का बनाने हेतु 
  कर्कशा का स्वांग किया आंसुओं को पी गयी।।


निष्कलंक मुख पर अमिट कलंक वाला 
  निज कर से निशान हमने बना दिया 
बेटा वन वासी औ सोहाग स्वर्ग वासी हुआ 
  सारे सुखों को मशान हमने बना दिया 
वीर मां का धर्म कर्म मुझको पुकारा जब 
  जिंदगी को रण गान हमने बना दिया 
वन में न जाता यदि कौन जान पाता तुझे 
  राम तुझे भगवान हमने बना दिया।।


गिरि जन मुनि जन और वनवासी गण 
  सबकी भलाई करने को तुझे भेजी हूं 
रीछ गीध वानरों की महाशक्तियों के साथ 
  मेल औ मिताई करने को तुझे भेजी हूं 
कपटी कुटिल दया हीन असुरों के साथ 
  विकट लड़ाई करने को तुझे भेजी हूं 
चौदह बरस राम वन में गंवाना मत 
  लंका पे चढ़ाई करने को तुझे भेजी हूं।।

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