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डाॅ सुषमा सिंह की माँ पर कविता

काव्य डेस्क

Kavita
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                                                  निढाल-निस्तेज तेरी देह देख 
तुम बिन निर्बल हो गई माँ, 
निज सर्वस्व जाता देख 
अपना सम्बल खो गई माँ। 

हुआ महाप्रयाण तेरा 
पर मुझ पर बीता महाप्रलय, 
जाने किस घड़ी-दुनिया में  
कर दिया विधाता ने तुझको विलय। 

मृत्यु का मातम समझूं या  
तेरी नवजीवन का पुनर्गमन, 
पल-पल यही सोच कर  
अंतर्मन में रहती अजीब कसक। 

कहते हैं ये सृष्टि वाले 
आत्मा होती अजर-अमर, 
पर अपने अंतस को कैसे समझाऊँ 
तुम बिन अंखियाँ रहती तरस। 

‘माँ‘, सीखा तुझसे पहला ‘ककहरा‘ 
आज भीतर तक भेद, निकलती कराह, 
वेदना-संवेदना के भँवर में अब सिसकूं 
क्यों ना आकर थामती और लेती मेरी थाह। 

गोल-गोल रोटी को देखूं
या देखूं धवल-उज्जवल चाँद को, 
निवाले से लेकर सांझी नींद तक 
नैना तकती तेरी राह को। 

स्मरण करती तेरा गौर मुख-मंडल 
और उस पर दमकती कानन-कुंडल, 
ऊँचे भाल पर सिंदूर लालिमा 
निश्छल माथे पर बिंदिया झिलमिल। 
 
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जी-भर जुटाती रही 
तेरे लिए मैं ये करूंगी, वो करूंगी, 
अब क्या मैं अपने हृदय-शूल से पूछूँ 
रज-भर तुम बिन मैं क्या कुछ कर सकूंगी? 

लाल-जोड़े की हसरत लिए 
ताउम्र संजोती रही सपने, 
पर ईश्वर को क्या मंजूर ना जाने 
पहले सज-धज तू ही विदा हो गई घर से। 

जाते-जाते आशीर्वाद दे गई 
बिटिया खूब पढ़े, खूब बढ़े, 
अपने पाँव पर खड़ी हो 
दो कुल का नाम रोशन करें। 
2 वर्ष पहले
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