निढाल-निस्तेज तेरी देह देख
तुम बिन निर्बल हो गई माँ,
निज सर्वस्व जाता देख
अपना सम्बल खो गई माँ।
हुआ महाप्रयाण तेरा
पर मुझ पर बीता महाप्रलय,
जाने किस घड़ी-दुनिया में
कर दिया विधाता ने तुझको विलय।
मृत्यु का मातम समझूं या
तेरी नवजीवन का पुनर्गमन,
पल-पल यही सोच कर
अंतर्मन में रहती अजीब कसक।
कहते हैं ये सृष्टि वाले
आत्मा होती अजर-अमर,
पर अपने अंतस को कैसे समझाऊँ
तुम बिन अंखियाँ रहती तरस।
‘माँ‘, सीखा तुझसे पहला ‘ककहरा‘
आज भीतर तक भेद, निकलती कराह,
वेदना-संवेदना के भँवर में अब सिसकूं
क्यों ना आकर थामती और लेती मेरी थाह।
गोल-गोल रोटी को देखूं
या देखूं धवल-उज्जवल चाँद को,
निवाले से लेकर सांझी नींद तक
नैना तकती तेरी राह को।
स्मरण करती तेरा गौर मुख-मंडल
और उस पर दमकती कानन-कुंडल,
ऊँचे भाल पर सिंदूर लालिमा
निश्छल माथे पर बिंदिया झिलमिल।
जी-भर जुटाती रही
तेरे लिए मैं ये करूंगी, वो करूंगी,
अब क्या मैं अपने हृदय-शूल से पूछूँ
रज-भर तुम बिन मैं क्या कुछ कर सकूंगी?
लाल-जोड़े की हसरत लिए
ताउम्र संजोती रही सपने,
पर ईश्वर को क्या मंजूर ना जाने
पहले सज-धज तू ही विदा हो गई घर से।
जाते-जाते आशीर्वाद दे गई
बिटिया खूब पढ़े, खूब बढ़े,
अपने पाँव पर खड़ी हो
दो कुल का नाम रोशन करें।
2 वर्ष पहले